स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज—चार शंकर पीठों में से एक जोशीमठ पीठ के शंकराचार्य, धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज की परंपरा से होते हुए ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद जी महाराज के शिष्य—आज केवल एक संत नहीं, बल्कि सनातन धर्म की जीवंत परंपरा के संवाहक हैं। वे निरंतर धर्म, समाज और राष्ट्र के जटिल प्रश्नों पर निर्भीक होकर मार्गदर्शन करते आए हैं।
ऐसे महामहिम शंकराचार्य के साथ तीर्थराज प्रयाग में, वह भी माघ मास के पावन मेले और मौनी अमावस्या जैसे परम पुण्यदायी दिन, जो कुछ घटित हुआ—वह न केवल दुखद है, बल्कि पूरे सनातन समाज के लिए गंभीर अपमान है।
सनातन परंपरा में यह सर्वविदित है कि माघ मेले में अग्र स्नान का अधिकार शंकराचार्यों को प्राप्त होता है। यह कोई व्यक्तिगत विशेषाधिकार नहीं, बल्कि शास्त्रसम्मत, सदियों से चली आ रही धार्मिक व्यवस्था है। किंतु आज उसी प्रयाग भूमि पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी को पुलिस द्वारा रोका गया, उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया और उनके साथ उपस्थित बटुक ब्रह्मचारियों के साथ मारपीट तक की गई। इससे भी अधिक पीड़ादायक तथ्य यह है कि उन्हें स्नान तक नहीं करने दिया गया।
इस अमर्यादा से आहत होकर शंकराचार्य जी ने पूरे दिन अन्न-जल त्याग कर मौन तप का मार्ग अपनाया। यह उनका विरोध नहीं, बल्कि शासन-सत्ता को दिया गया धार्मिक और नैतिक संदेश है—कि जब सत्ता धर्म की मर्यादा भूल जाती है, तब संत मौन से भी चेतावनी देते हैं।
आज भारत में यदि एक शंकराचार्य सुरक्षित नहीं है, यदि सनातन की सर्वोच्च परंपरा का सम्मान नहीं है, तो यह केवल किसी एक व्यक्ति का अपमान नहीं—यह सनातन संस्कृति, धार्मिक स्वतंत्रता और भारतीय आत्मा पर प्रहार है।
यह घटना स्पष्ट संकेत देती है कि शासन-सत्ता धर्मविमुख होकर अनैतिकता की दिशा में बढ़ रही है, जहाँ प्रशासनिक अहंकार, आध्यात्मिक गरिमा से ऊपर रखा जा रहा है। तीर्थों पर यदि संतों का अपमान होगा, तो समाज में संदेश क्या जाएगा?
त्वरित टिप्पणी - Devanand Nayak (संपादक DN Live )
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