*बात विकास और भ्रष्टाचार पर होनी थी लेकिन जातियता की दुहाई देकर अस्तित्व बचाने की कोशिश हो रही है*
📝 देवानंद नायक @9713989417
लहार विधानसभा क्षेत्र का दिसंबर 1990 से दिसंबर 2023 तक प्रतिनिधित्व करने वाले लहार के पूर्व माननीय विधायक रहे डॉ गोविंद सिंह का सियासी सफर समाजवाद के रहनुमाई करते हुए शुरू हुआ हालांकि हमारे देश का समाजवाद इस तरह जैसे फायर बुझाने की बाल्टी पर आग लिखा होता है लेकिन उसमे होता पानी या रेत है वैसे ही समाजवाद का सफर लोकदल जनता पार्टी व्हाया जनता दल कांग्रेस तक पहुंचा इस सफर लहार नगर के सुभाष वाचनालय जो लोक दल उसके बाद जनता पार्टी फिर जनता दल का कार्यालय बना फिर कांग्रेस का दफ्तर और समता ट्रस्ट बनाया गया और उसकी अध्यक्षता उन महाशय द्वारा की जा रही है जो एक साथ ग्राम पंचायत के सरपंच और दुग्ध संघ के अध्यक्ष रहे है लहार का प्रतिनिधित्व करने वाले माननीय पूर्व विधायक जी अब वरिष्ठ नागरिक भी है बुजुर्ग है 73 वर्षीय है उन्होंने अपने सियासी सफर में जो शिखर पर पहुंच कर वापस जमीन तक आने की अवनति देखी है उससे भी ज्यादा बुरी बात तो यह है जो व्यक्ति जीवन भर समाजवाद की बात करता रहा है उसके राजनीतिक विरासत के दावेदारों को जातियता की दुहाई देनी पड़ती है इससे बुरी दुर्गति और क्या होगी हालांकि उनके समाजवाद के अर्थ दिखाने में उनके नाम के आगे लगे डा. की तरह है जो कुछ लोगो के लिए डाक्टर साहब होंगे लेकिन उन लोगो के लिए डा का अर्थ डाकू ही है जिनके सपनों पर ,संपत्ति पर , खुशियों पर ,कैरियर पर , हक पर डाका डाला गया वक्त सब का हिसाब करता है मेरा एक सवाल है कि किसी की संपत्ति पर अतिक्रमण से समाज का क्या लाभ और अतिक्रमण हटाने से समाज को क्या हानि, लाभ या हानि उसको होगी जिसने अतिक्रमण किया अब इसमें जातिवाद की दुहाई देकर क्या साबित करना चाहते हो लिखने को बहुत कुछ है बस केवल इतना ही लिखूंगा डॉक्टर साहब आपने हम जैसे जाने कितने युवाओं के जीवन के साथ खिलवाड़ किया है फिर भी आप की बुजुर्गियत का हम सम्मान करते हुए यही सलाह देंगे की आप धृतराष्ट्ररूपी विचारधारा को आप पोषित कर रहे है आप अभी भी दूरी बना ले इस विचारधारा के वाहक दुर्योधन और दुशासन ही विरासत में मिलते है जो राज्य वैभव ,यश कीर्ति के साथ कुल पर भी कलंक लगा देते है इससे बचें अंत में यही कहूंगा
*अहंकार न पालिए जानब ,वक्त के समुंदर में कई सिकंदर डूबते देखे है*
कुछ पंक्तियां आपके लिए पेशे खिदमत है
*पोरस को बता दें ये सिकंदर को बता दें,*
*क़तरा हैं मगर फिर भी समंदर को बता दें !*
*हम ज़ुल्म के आगे ना झुके हैं ना झुकेंगे,*
*ये बात चलो वक्त के हिटलर को बता दें !!!*

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