गाय,अदालत, सरकार और तालिबान written by Rakesh achal



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गनीमत है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाय को लेकर कोई फैसला नहीं बल्कि सुझाव दिया है अन्यथा आज से ही पूरे मुल्क में 'गाय हमारी माता है ,पंजे से क्या नाता है ' का नारा बुलंद हो सकता था .इलाहाबाद हाईकोर्ट के विद्वान न्यायामूर्ति शेखर कुमार यादव ने गाय की हत्या के आरोपी संभल के जावेद की जमानत अर्जी खारिज करते हुए सुझाव दिया है की गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाये .
दरअसल न्यायमूर्ति यादव ने वही सब कहा है जो इस देश की सरकार चाहती है,जन मानस में भी शायद यही बात हो ,लेकिन इसके अनेक अर्थ निकाले जा सकते हैं.न्यायमूर्ति ने टिप्पणी करते हुए कहा कि-' गो मांस खाना किसी का मौलिक अधिकार नहीं है। जीभ के स्वाद के लिए जीवन का अधिकार नहीं छीना जा सकता। बूढ़ी बीमार गाय भी कृषि के लिए उपयोगी है।[कैसे है,पता नहीं ] इसकी हत्या की इजाजत देना ठीक नहीं। यदि गाय को मारने वाले को छोड़ा गया तो वह फिर अपराध करेगा।' हाई कोर्ट ने वैदिक, पौराणिक, सांस्कृतिक महत्व व सामाजिक उपयोगिता को देखते हुए गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का सुझाव दिया है। कोर्ट ने कहा कि 'भारत में गाय को माता मानते हैं। यह हिंदुओं की आस्था का विषय है। आस्था पर चोट करने से देश कमजोर होता है।'
गाय को लेकर एक माननीय न्यायमूर्ति की ये टिप्पणी उस समय आयी है जब पूरी दुनिया में धर्म कि आधार पर अफगानिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र बनाये जाने की घटना को लेकर गंभीर चिंता जताई जा रही है .माननीय अदालत कहती है कि ' कि गोरक्षा का काम केवल एक धर्म संप्रदाय का नहीं है और न ही गायों को सिर्फ धार्मिक नजरिए से नहीं देखना चाहिए, बल्कि गाय भारत की संस्कृति है और संस्कृति की रक्षा का कार्य देश के प्रत्येक नागरिक का है। माननीय अदालत ने कहा कि पूरे विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां सभी संप्रदायों के लोग रहते हैं। देश में पूजा पद्धति भले अलग-अलग हो, लेकिन सबकी सोच एक है। सभी एक-दूसरे के धर्म का आदर करते हैं। '
माननीय हाई कोर्ट ने कहा कि देश के 29 में से 24 राज्यों में गोवध प्रतिबंधित है। एक गाय जीवनकाल में 410 से 440 लोगों का भोजन जुटाती है। वहीं, गोमांस से केवल 80 लोगों का पेट भरता है। महाराजा रणजीत सिंह ने गो हत्या पर मृत्यु दंड देने का आदेश दिया था। यही नहीं, कई मुस्लिम और हिंदू राजाओं ने गोवध पर रोक लगाई थी। गाय का मल व मूत्र असाध्य रोगों में लाभकारी है। गाय की महिमा का वेदों-पुराणों में बखान किया गया है। रसखान ने कहा है कि 'उन्हें जन्म मिले तो नंद के गायों के बीच मिले।' गाय की चर्बी को लेकर मंगल पांडेय ने क्रांति की थी। संविधान में भी गो संरक्षण पर बल दिया गया है।
अदालत को भी वही चिंता है जो एक सजग भारतीय नागरिक को है,यानि तालिबान की चिंता .माननीय अदालत कहती है कि -'सैकड़ों उदाहरण हमारे देश में हैं जब-जब हम अपनी संस्कृति को भूले हैं विदेशियों ने हम पर आक्रमण कर गुलाम बनाया और आज भी न चेते तो अफगानिस्तान पर निरंकुश तालिबान का आक्रमण और कब्जे को हमें नहीं भूलना चाहिए।'माननीय हाई कोर्ट ने कहा, कि सरकार को संसद में बिल लाकर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करना होगा। उन लोगों के विरुद्ध कड़े कानून बनाने होंगे जो गाय को नुकसान पहुंचाने की बात करते हैं। दंडित करने का कानून उनके लिए भी बने जो छद्मवेशी होकर गोरक्षा की बात गोशाला आदि बनाकर करते हैं लेकिन गाय की सुरक्षा से उनका कोई सरोकार नहीं होता। उनका एकमात्र उद्देश्य पैसा कमाना है। गो संरक्षण और संवर्धन का काम केवल एक मत और संप्रदाय का नहीं है। बल्कि गाय भारत की संस्कृति है और संस्कृति को बचाने का काम भारत के हर नागरिक को करना चाहिए, फिर चाहे वह किसी धर्म या पंथ का हो।
माननीय अदालत की टिप्पणी को मै तालिबानी मानसिकता से ग्रस्त किसी भी सूरत में नहीं कह सकता ,भले ही ऐसा प्रतीत होता हो ,पर देश की सरकार संसद में विधेयक लाएगी या नहीं ये कहना अभी जल्दबाजी होगी ,लेकिन इस टिप्पणी पर सतर्क होने की जरूरत जरूर है. कल्पना कीजिये की यदि हमारी अदालतें जो क़ानून कि सहारे चलती हैं वे यदि दल कि सहारे चलने लगें तो क्या सूरत बनेगी ?एक हिन्दू कि नाते गाय को मै भी गाय को माता मानता हूँ,गाय को पूजता हूँ,पंचामृत में गाय कि दूध,दही का इस्तेमाल करता हूँ ,लेकिन फिर भी मै न तो देश में गाय के वध को रोकने की वकालत करता हूँ और न गाय कि मांस पर प्रतिबंध न लगा पाने कि लिए केंद्र सरकार को कोसता हूँ .क्योंकि गाय गरीब की जोरू नहीं हमारी अर्थव्यवस्था का एक अंग है.
गाय को लेकर अदालत का जजबाती होना चौंकाता है,क्योंकि अदालत कि सामने गाय के वजूद का मामला विचार कि लिए नहीं था,प्रकरण गौहत्या कि एक आरोपी की जमानत का था. जमानत मिले या न मिले ये अदालत का क्षेत्राधिकार है लेकिन अदालत धर्मगुरुओं की तरह गाय पर व्याख्यान दे तो कुछ विचित्र लगता है. मै चूंकि क़ानून का भी छात्र हूँ इसलिए देश की समस्त अदालतों कि प्रति पूरा सम्मान भाव रखते हुए ये कहना चाहता हूँ कि अदलातों को किसी राजनितिक दल या धर्म की बैसाखी बनने से बचना चाहिए .जो काम अदालत का है उसे अदालत करे और जो काम सरकार का है ,सरकार करे. गौवध पर सम्पूर्ण रोक सरकार का काम है. देश में पूर्ण बहुमत की सरकार है.सरकार का नेतृत्व एक अत्यंत समर्थ प्रधानमंत्री कि हाथों में है.वे यदि जरूरी समझते तो बीते सात साल में वो सब कर सकते थे जो करने कि लिए माननीय अदालत ने कहा है .
गाय को लेकर पूरब से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक अलग -अलग मान्यता है .हिंदी पट्टी में यदि लोग गाय में 33 कोटि देवताओं का निवास मानते हैं तो पूरब में गाय मांसाहार का एक प्रमुख स्रोत है .हमारी सरकारों कि अनेक मंत्री गाय का मांस रुचिपूर्वक खाते हैं .हमारी सरकार देश से गौमांस कि निर्यात की इजाजत देती है .यदि गाय समूचे देश का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व कर रही होती तो मुझे नहीं लगता कि बीते सात साल में हिंदुत्व का धर्म ध्वज फहराने वाली केंद्र सरकार इस सब पर रोक न लगाती ?
बहरहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट का कृतज्ञ हूँ की उसने [माफ़ कीजिये अभी इसका नाम प्रयाग हाईकोर्ट नहीं हुआ है ] हिन्दुओं की दुखती रग पर हाथ रख दिया है. अब सरकार को तय करना है कि वो उत्तर प्रदेश विधानसभा कि आने वाले चुनाव में हाईकोर्ट कि सुझावों को अपने चुनाव घोषणा पत्र का अंग बनाएगी या फिर अदालत कि सुझावों को दरकिनार करते हुए देश में एक धर्मनिरपेक्ष सरकार का उत्तरदायित्व निभाएगी ? हम सब सरकार कि फैसले की प्रतीक्षा करेंगे ,शायद गायों की किस्मत से कुछ नया हो जाये !
@ राकेश अचल

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