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जैसे झूठ के पांव नहीं होते लेकिन झूठ चलता है वैसे ही बदनामी के भी पांव नहीं होते किन्तु बदनामी हवा के साथ उड़कर हजारों मील दूर तक चली जाती है हिन्दुस्तान से पंद्रह हजार किमी दूर आज शाम अमरीका के फीनिक्स शहर में जब मै एक बागीचे में चहलकदमी कर रहा था तो मैंने दो हिन्दुस्तानी युवाओं को गंगा में लाशों के मिलने के बारे में चर्चा करते सुना.एक ने कहा -'ये तो अति हो गयी'.दूसरे ने कहा-'दिस इज दी ब्रोकन इंडिया '..
भारत में नदियों में लावारिश शवों के मिलने की खबर सीएनएन और अन्य चैनलों की सुर्ख़ियों में शामिल है .अमरीका के लोग हैरान हैं कि दुनिया की इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था में लाशों के साथ ऐसा बर्ताव कैसे हो सकता है .विदेशियों के मन में जुगप्सा है इन खबरों को लेकर .यही खबरें किसी छोटे,भुखमरी के शिकार देश से आतीं तो शायद कोई नहीं चौंकता किन्तु खबरें महाबली और विश्वगुरू उस भारत से आ रहीं है जिसके प्रधानमंत्री धवल केशधारी श्री नरेंद्र मोदी है .सबसे ज्यादा कर्मठ और सबसे ज्यादा ईमानदार .
भारत में साधकों और उम्रदराज वैराग्य धारण करने वालों के लिए जल समाधि की व्यवस्था है लेकिन कलिकाल में ऐसी जलसमाधियाँ बहुत कम लोग लेते हैं .ऐसे लोगों के शव अगर नदी की धारा के साथ बहते हुए मिल भी जाएँ तो कोई हतप्रभ नहीं होता किन्तु कोरोनाकाल में जब पुण्य सलिला गंगा थोक में लाशें उगलती है तो डर लगता है,अनिष्ट की आशंका होती है .यही सब हुआ जब बिहार के बक्सर में गंगा नदी के किनारे चौसा घाट पर .यहां अनेक लावारिस पड़े शव देखें गए, जिसके बाद इलाके में हड़कंप मच गया है. बताया जा रहा है कि करीब 30-40 शव गंगा के किनारे पड़े हुअए थे . घटना की जानकारी के बाद वहां पर आला अधिकारियों की एक टीम पहुंची.
शवों के मिलने की जानकारी मिलते ही कलेक्टर अमन समीर ने बताया कि ये सभी लाशें यूपी से बहकर यहां तक पहुंची हैं. कलेक्टर ने कहा कि चौसा के महादेवा घाट के किनारे 30 शव मिले हैं.यूपी के बारा घाट पर भी 16 शव गंगा में पानी के ऊपर उतराते मिले. इन शवों की दुर्गंध से आसपास के लोगों का जीना मुश्किल हो गया है.स्थानीय लोग बताते हैं कि गंगा के अलग-अलग किनारों पर ऐसे लावारिस शवों की संख्या सैकड़ों में है .,
कोरोनाकाल में महज इलाज से लुटे-पिटे लोग इतने परेशान हैं कि उनके पास मृतकों के अंतिम संस्कार तक के लिए पैसे नहीं हैं.पैसे हैं तो श्मशानों में लकड़ियां नहीं हैं, विद्युत शवदाह गृह गांवों में होते नहीं ऐसे में मृतकों को आधा-अधूरा जलाकर नदियों में बहाया जाना ही अंतिम विकल्प बचता है ,बक्सर में रविवार को 76 शव सरकारी आंकड़ों में दर्ज हुए, जबकि 100 से ज्यादा अंतिम संस्कार हुए। रोजाना 20 से ज्यादा लोग श्मशान घाट में रजिस्ट्रेशन भी नहीं कराते। चौसा में भी 25 शवों का अंतिम संस्कार किया गया। इनमें 7 को जलाया गया, वहीं 16 शवों को नदी में बहा दिया गया।
उत्तर प्रदेश में शवदाह को निशुल्क कर दिया गया है लेकिन सबको इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा.ऐसे में शवों के साथ जो किया जा सकता है सो किया जा रहा है .मजबूरी में पतितपावनी गंगा को दूषित करने वाले ख़ामश हैं और सरकार के पास तो कोई आपात योजना है ही नहीं .मृतकों की छोड़िये जीवितों तक के लिए हमारी सरकार के पास अब तक कोई योजना नहीं है .जो मर चुके हैं वे अपने साथ आक्सीजन और दवाएं ही नहीं बल्कि पलंग न होने की शिकायत भी ले गए लेकिन जो जीवित हैं उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है .जो हो रहा है सब अच्छा हो रहा है ,.
भारतीय लोकतंत्र के पहरुओं की हकीकत नहीं दिखाई देती ,वे हर जबाबदेही से मुक्त हो चके हैं .उनके अनुसार सरकार जितना कुछ कर रहीं है वो काफी है अब लोकतंत्र लाशों का लोकतंत्र है.यहां लाशों की राजनीति करने का पुराना चलन है .यहां अस्पताल लाशें तब देते हैं जब उनका पूरा भुगतान न मिल जाये. कभी ऐसे मामलों में नेताओं को दखल देना पड़ता है तो कभी नौकरशाहों को .जिसके पास ये दोनों नहीं हैं वे किसी काम के नहीं हैं .देश में ऐसे लोगों की संख्या देश में कम नहीं है ,.
भारत में नदियों का खासतौर पर गंगा का दर्शन ,धर्म और जीवन में विशेष स्थान रहा है .हम आखरी वक्त में गंगाजल मुंह में डालते हैंक्योंकि इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है .जैसे इस्लाम में आबेजमजम पवित्र माना जाता है वैसे ही ये गंगाजल है किन्तु दुर्भाग्य ये कि इसी गंगाजल से हम स्नान भी करते हैं और मज्जन भी ,शौचकर्म भी .इसी गंगा में हम शव भी प्रवाहित करते हैं लेकिन हमें न कोई ग्लानि होती है,न घिन आती है और न हम इसके लिए कोई प्रयाश्चित करते हैं .
आज भारत में जो गंगा शव उगल रही है उसी के बेटे देश के प्रधानमंत्री है.गंगा ने उन्हें गुजरात से उत्तरप्रदेश बुलाकर देश का उत्तरदायित्व सौंपा था ,किन्तु गंगा से शव उगलते देख वे भी मौन हैं.मौन क्या वे तो अब स्थितप्रज्ञ हैं .उन्हें गंगा में बहते शव दिखाई भी दे जाएँ तो क्या फर्क पड़ता है ?वे तो देश से हर रोज तीन- चार हजार लोगों को राख में बदलते देख रहे हैं .लेकिन रघुवंशी भगीरथ को शायद कलिकाल में इन दुर्दिनों का अनुमान रहा होगा ,इसीलिए वे गंगा को धरती पर लाये ,यदि ऐसा न होता तो गंगा भारत के अलावा किसी दुसरे देश में भी लायी जा सकती थी
बहरहाल मै विषय से भटकना नहीं चाहता. मेरा कहना ये है कि देश की अर्थव्यवस्था को कम से कम इतना तो मजबूत होना ही चाहिए कि देश में शवों को बिना अंतिम संस्कार के पवित्र नदियों में प्रवाहित न किया जाये और वो भी लावारिश मानकर . .गंगा और दूसरी नदियों के जिन घाटों पर ये लावारिस शव मिले हैं उन इलाकों के प्रशासन को इसके लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए ,क्योंकि जन्म-मृत्यु की सूचनाओं के पंजीकरण का काम भी इन्हीं के पास होता है .देश की पवित्र नदियों में अनाम शवों का मिलना ' राष्ट्रीय शर्म ' का विषय है .इस तरह की घटाओं से हमारी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी हो रही है .यानि हमारा सिस्टम,हमारे नेता इतने निरीह हैं कि वे महामारी के शिकार लोगों का अंतिम संस्कार भी सम्मान के साथ करने की स्थिति में नहीं हैं .
जिस देश में सम्मान के साथ जीना तो छोड़िये सम्मान के साथ मरना भी नसीब न हो उस देश के नेतृत्व पर छींटाकशी करने का कोई अर्थ नहीं है.क्योंकि ये राष्ट्रविरोधी कार्य है.नेतृत्व को सवालों के दायरे में लाना देशद्रोह है.मानता हूँ कि राज्य और केंद्र सरकारें 'संगदिल' हो गयीं है किन्तु क्या हमारे स्वयंसेवी संगठन इस जिम्मेदारी को नहीं निभा सकते. यदि भारत में अनाम शवों का अंतिम संस्कार सम्मान के साथ होने लागे तो समझिये की मौजूदा संकट से बचाने के साथ ही देश को बदनाम होने से भी बचा सकेंगे .गंगा को अपावन करने के लिए .कोईगंगा से माफी मांगे या न मांगे किन्तु मै पतित पावनि गंगा से क्षमायाचना करता हूँ.मेरी सुरसरि से प्रार्थना है कि वो हम निरीह,नासमझ और विवश भारतीयों को इस अपराध के लिए क्षमा कर दे ..
@ राकेश अचल वरिष्ठ पत्रकार
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