उमा भारती : कैसे बनकर रह गई हिन्दुत्व की प्रखर नेत्री से महज एक जाति की नेत्री




देवानंद शर्मा 

देश मे जब  नब्बे के दशक में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था तब दो नेत्रियां देश मे अपनी वाक कला और जनता को  शब्द आकर्षण के माध्यम से जनता को समोहित कर बांधकर रखने और धाराप्रवाह भाषण देने के लिये पहचान बना चुकी थी तत्कालीन परिस्थितियों में  हिंदुत्व की प्रखर वक्ता या यूं कहें हिंदुत्व की देवी बन कर उभरने वाली वह दो नेत्रियां थी साध्वी ऋतंभरा और साध्वी उमा भारती  बाद में दोनों ने अलग राह चुनी ऋतम्भरा अध्यात्म की राह पर आगे बढ़कर  बच्चों के लिये वात्सल्य ग्राम नाम से आश्रम चला रही हैं वहीं इनसे जुदा उमा भारती ने भगवा चोला पहन कर सियासत में कदम बढ़ाये सांसद, विधायक , केंद्रीय मंत्री व मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री से होती हुई उत्तर प्रदेश में भाजपा का चेहरा बनी पुनः केंद्रीय मंत्री बनने तक का सफर तय किया  किन्तु पिछले चार दशकों में सियासत में उमा भारती ने कई उत्थान और पतन के मंजर देखे होंगे उन्होंने कभी कल्पना नही की होगी कि जिस भाजपा और संघ की सियासत में उन्होंने सारा जीवन होम दिया एक दिन वह उन्हें मात्र एक जातीय या सजातीय वोटरों को लुभाने वाला नेता मात्र बनाकर छोड़ देंगे
*उमा के उत्थान व अवसान की पटकथा*
उमा भारती दो हजार के दशक की शुरुआत में  अपनी राजनैतिक सफर के चरम पर थी जब उन्हें भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने संघ के इशारे पर मप्र की सियासी कमान सौंपी मध्यप्रदेश में उन दिनों दिग्गी राजा का सियासी डंका बजता था दस वर्ष तक सूबे की सरदार रहे राजा दिग्विजयसिंह को उखाड़ फेंकने के लिए सन्यासिन उमा भारती ने संकल्प लिया और अटल जी से आशीर्वाद लेने पहुंची मध्यप्रदेश की सियासत में उस समय तक ब्राह्मण और ठाकुर राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी  तो थे ही उसके साथ प्रदेश का सर्वाधिक नेतृत्व ब्राह्मण या ठाकुर ने मुख्यमंत्री के रूप किया था मप्र की सियासत को समझने बाली उमा भारती जानती थी ठाकुर खेमा अधिकांशतः दिग्गी राजा के पक्ष में हैं तो उन्होंने  प्रदेश अध्यक्ष में पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी को सूबे की कमान सौपनी की मांग भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व से की और शीर्ष द्वारा यह मांग भी स्वीकार कर ली और उमा के साथी और प्रमुख रणनीतिकार के रूप ने संघ ने बेहद सरल अनिल माधव दवे को भेजा जो बाद में बतौर राज्यसभा सांसद संसद में पैहुँचे और मोदी कैबिनेट के हिस्सा भी रहे और अब इस दुनिया मे नही है  ठाकुर समीकरण को साधने के लिये संगठन मंत्री के तौर पर भिण्ड (जिले के गढ़पारा गांव के मूल निवासी ) चम्बल के संघी कप्तान सिंह सोलंकी को कमान दी गई 
उमा के आक्रमक व्यक्तित्व  और दिग्विजय के मुखर विरोध करने की शैली ने जनता के दिलोदिमाग में  गहरी छाप छोड़ी उमा ने बिजली सड़क पानी को मुद्दा बना कर दिग्विजयी सत्ता को उखाड़ फेंके किन्तु उमा भारती को सत्ता सुख ज्यादा समय तक नही मिल पाया और एक पुराने मामले में जिसमे उमा ने हुगली में एक मस्जिद में तिरंगा फहराया था उस मामले में कोर्ट से गैरजमानती वारंट जारी हुआ जिसके चलते उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा ,उसके बाद उमाभारती को आडवाणी से विवाद के चलते पार्टी छोड़ना पड़ी , भारतीय जनशक्ति नाम से नए दल का गठन किया मध्यप्रदेश चुनाव 2008 में करारी शिकस्त हुई यहाँ तक  की उमाभारती खुद की सीट नही बचा पाई हालाकिं चार विधायक भाजश के टिकट पर विधानसभा पहुँचे यहीं से उमा भारती के राजनीतिक अवसान की शुरुआत हुई
उमा भारती की पार्टी  में आंतरिक  कलह के बाद विखराव देखने को मिला 2012 के उत्तरप्रदेश चुनाव से पूर्व उमा भारती की संघ के हस्तक्षेप या यूं कहें संघ की राजनीतिक रणनीति के तहत वापसी हुई उमा भारती को संघ ने मध्यप्रदेश से तो दूर रखा ही साथ ही कट्टर हिंदुत्व की छवि बाली उमाश्री को उत्तर प्रदेश में पिछडो की नेता बना कर हाशिये पर पड़ी  भाजपा को सत्ता में लाने का असफल प्रयास किया गया  उमा भारती बुंदेलखंड इलाके में महोबा की चरखारी सीट से विधायक तो बनी  किन्तु भाजपा के लिए लखनऊ अभी दूर थी  2014 के  लोकसभा चुनाव में उमा को बुंदेलखंड तक सीमित कर दिया   बुंदेलखंड के सेंटर पॉइंट झांसी से लोकसभा चुनाव लड़वाया और वह सांसद व केंद्रीय मंत्री बनी केंद्र में कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय नही मिला  संघ ने उन्हें झांसी ललितपुर के इलाके में लोधा या लोध , लोधी जाति बाहुल्य होने की बजह से उन्हें चुनाव लड़वाया था  2019 के लोकसभा के एक वर्ष पूर्व यानी 2018 में मप्र विधानसभा चुनाव से पूर्व ही उमा भारती ने लोकसभा चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी थी शायद उनके मन मे सियासी  महत्वकांक्षाएं जाग उठी थी कि शिवराज की जगह मप्र में उन्हें फिर कमान दी जाए  पर संघ जिसे ठिकाने लगाने का मन बना लेता है तो उसे पता नही चलता कब वह गोविंदाचार्य और संजय जोशी या प्रवीण तोगड़िया की तरह गर्दिश में चला जाये लेकिन उमाश्री के साथ स्तिथि थोड़ी अलग है  2019 में  भोपाल के रास्ते मप्र वापसी की एक बार पुनः आस जगी किन्तु संघ ने प्रज्ञा ठाकुर पर दांव लगाया  और उसके बाद अभी मप्र में चल रहे उपचुनावों तक उमा भारती की प्रासंगिकता वहीं बची है जहां लोधी , लोधा राजपूत वोट है संघ या  बीजेपी उनकी सभाएं उन्ही क्षेत्रो में करवा रही है जहाँ उनका सजातीय वोटर हैं एक कट्टर हिंदुत्व की नेत्री से एक जाति की नेता बन कर रह गई उमाश्री भारती ने भी कभी कल्पना नही की होगी कि उनका राजनीतिक अवसान इस तरह होगा

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