देवानन्द नायक @9713989417
मध्यप्रदेश में भले ही कमलनाथ की बिदाई सत्ता के गलियारों से हो गई हो ,लेकिन सूबे की सियासत में वर्चस्व की जंग अब भी जारी है मध्य प्रदेश की सियासत के महाराज यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया भले ही बीजेपी में पहुंच गये हो किन्तु उनके समर्थकों यानी पूर्व कांग्रेसी और उनके समर्थक रहे कुछ वर्तमान कॉंग्रेसी और विरोधी धड़ों के कांग्रेसी नेताओं के बीच ऐसा रणनीतिक चक्रव्यूह बना हुआ है कि वह अपने वर्चस्व और भावी राजनीति को लेकर चिंतित हैं आज सूबे में खास कर ग्वालियर चम्बल में तीन कैटेगरी के राजनेता में बांट कर बात करें तो एक तो पूर्व कांग्रेसी है जो सिंधिया के साथ पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गए उनके लिए धर्म संकट यह है कि उनके प्रतिद्वंद्वी जिनके विरूध्द वह लड़ते रहे हैं उनके साथ कार्य करना है और उन कांग्रेसियों के खिलाफ लड़ना होगा जो कभी उनके सहयोगी रहे होंगे अब ऐसी स्तिथि में पूर्णतया न भाजपाइयों पर विश्वास कर पा रहे हैं न कांग्रेसी पूर्व समर्थको पर
अब दूसरी कैटेगरी की बात करें तो वह कांग्रेसी नेता जो कभी सिंधिया समर्थक थे किन्तु कांग्रेस में ही बने रहे पार्टी नही छोड़ी अब उनके नेता और गॉडफादर रहे सिंधिया के न रहते उनकी राह कितनी मुश्किल है यह वह अच्छे से समझते हैं क्योंकि उन्हें पार्टी के अंदर उनके विरोधी धड़े के नेता जिनके खिलाफ वह हमेशा से ही रहे हैं वह उनके राह में कांटे बिझने का कार्य करेंगे तीसरे कैटेगरी में वह नेता जो सिंधिया विरोधी कांग्रेसी रहे हैं और उनके खिलाफ झंडा बुलंद करते रहे हैं उनके लिए सिंधिया के पार्टी से बाहर जाते ही अपना कद बड़ा करने का मौका सामने है और वह उसे भुनाने के लिए पूरी तरह प्रयासरत है लेकिन उनकी राह में कांटे बिछा रहे हैं कांग्रेसी नेता ही है
क्षत्रिय बर्चस्व की जंग और कांग्रेस की सियासत
प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस के सिंधिया की खली हुई जगह को भरने की बेताबी ग्वालियर चम्बल अंचल के वरिष्ठ कांग्रेसी डॉ गोविंद सिंह के द्वारा दिखाई जा रही है और हो भी क्यों न 7 वीं बार विधायक बनने बाले डॉ गोविंद सिंह के अलावा कांग्रेस के पास कोई चेहरा नही दिखता जो सिंधिया के खिलाफ झंडा थाम सकें कांग्रेस भी श्री सिंह को कमान दे कर नेता प्रतिपक्ष बनाने का मन भी बना चुकी थी किन्तु उनके अपने कांग्रेसी ही उनकी राह में रोड़ा बन कर सिंह की ताजपोशी को लटका दिया इधर गोविंद सिंह ग्वालियर में तो कभी अंचल में संभावित उम्मीदवार व संभावित सहयोगी और सिंधिया से नाराज व विरोधी को साधने में लगे हैं व सिंधिया खेमे में रहे कांग्रेसी सुनील शर्मा सहित कई "गोविंद दरबार" में हाजिरी लगा चुके हैं तो कोई "गोविंद चालीसा" पढ़ रहे हैं बताया तो यह जा रहे पूर्व मंत्री राकेश सिंह चतुर्वेदी भी अब गोविंद के जरिये कांग्रेस में सम्भावनाओं को तलाश रहे हैं उधर पूर्व नेता प्रतिपक्ष रहे स्वर्गीय सत्यदेव कटारे के नजदीकी रिश्तेदार वीरेंद्र डी शर्मा भी गोविंद दरबार मे नतमस्तक होने की खबर है किन्तु डॉ गोविंद सिंह की राह इतनी आसान नजर नही आ रही है क्योकि चंबल के मुरैना में सर्वाधिक सीटों पर उपचुनाव होना है और यहीं से गोविंद सिंह को सबसे बड़ी चुनौती मिलती दिख रही है यह वह क्षेत्र है जहां से गोविंद सिंह केंद्र की सियासत में जाने का रास्ता तलाशने की कोशिश 2014 में कर चुके हैं लेकिन यहाँ मिली शिकस्त को वह भुला नहीं पाएंगे यहाँ पर जो उनकी हार का कारण बने थे वह नेता वृंदा सिकरवार एक बार फिर उनके सामने आगये है एक सांध्य अखबार में छपी खबर के मुताबिक श्री सिकरवार गोविंद सिंह के खिलाफ खुलकर सामने आ गए हैं उन्होंने बिना नाम लिया गोविंद सिंह के बारे यह भी कह दिया कि उन्हें भृम हो गया है वह मुख्यमंत्री बनने की जल्दी में है गौरतलब है कि गोविंद सिंह और वृन्दा सिकरवार के बीच की जंग केवल राजनीतिक नही है बल्कि यह क्षत्रिय समाज के एकक्षत्र नेता बनने की जंग है यहां बतादें कि मुरैना जिले में भाजपा नेता गजराज सिंह सिकरवार का और उनके परिवार का क्षत्रिय समाज मे बड़ा रसूख है उसी परिवार के सदस्य है वृन्दावन सिंह सिकरवार उधर गोविंद सिंह की महत्त्वकांक्षा भी ग्वालियर चम्बल में एकछत्र क्षत्रिय नेता बनने की रही है किंतु यह सिकरवार परिवार कभी नही चाहता है कि गोविंद सिंह नेता बने , वृन्दा सिकरवार के चुनाव लड़ने से 2014 में गोविंद सिंह की करारी शिकस्त हुई थी वह कसक आज भी नही भूलते है अब एक बार वृन्दा उनके सामने खड़े हो कर उनके अस्तित्व को चुनौती दे रहे हैं देखना है परिणाम क्या होगा ? यह भविष्य के गर्त में है

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