#शुंग_वंश(#ब्राह्मण_साम्राजय)
लेखक :^ देवानन्द_नायक
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद पुष्यमित्र शुंग ने शुंग वंश की नींव रखी ,हालाकिं पुष्यमित्र शुंग ने कभी स्वयं को राजा नही माना और हमेशा सेनानी की पदवी को धारण किये रहे मौर्योत्तर काल मे शुंग वंश के शासन काल मे कई महत्वपूर्ण परिवर्तन आये बौद्ध धर्म अब राजधर्म नही रहा सनातन धर्म को पुनर्जीवित व पुनर्स्थापित करने मर पुष्यमित्र शुंग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है आज नवबौध्द आज भी पुष्यमित्र शुंग का नाम लेकर ब्राह्मणों के प्रति गलत नजरिया रखते हैं पुष्यमित्र शुंग का साम्राज्य भले ही चन्द्रगुप्त जितना विस्तृत नही था किंतु उन्होंने न सिर्फ बिखरे साम्राज्य को संगठित किया बल्कि उसे मजबूती प्रदान की
#पुष्यमित्र_के_साम्राज्य तथा शासन (Empire and Rule of Pushyamitra):
पुष्यमित्र प्राचीन मौर्य साम्राज्य के मध्यवर्ती भाग को सुरक्षित रख सकने में सफल रहा है । उसके साम्राज्य में अयोध्या तथा विदिशा निश्चित रूप से सम्मिलित थे । अयोध्या के लेख में पुष्यमित्र का उल्लेख मिलता है । विदिशा में उसका पुत्र अग्निमित्र शासन करता था ।
मालविकाग्निमित्र के अनुसार विदर्भ का राज्य उसके अधीन था । दिव्यावदान तथा तारानाथ के विवरण के अनुसार जालन्धर तथा शाकल (स्यालकोट) पर भी उसका अधिकार था ।
इस प्रकार उसका साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बरार तक तथा पश्चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में मगध तक विस्तृत था । पाटलिपुत्र अब भी इस साम्राज्य की राजधानी थी । पुष्यमित्र की शासन-व्यवस्था के विषय में हमें ज्ञात नहीं है ।
लगता है कि उसने मौर्य प्रशासन के स्वरूप को ही बनाये रखा । मनुस्मृति के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सम्राट अपनी दैवी उत्पत्ति में विश्वास करता था । के. पी. जायसवाल का विचार है कि मनु ने राजा की दैवी उत्पत्ति का सिद्धान्त पुष्यमित्र के ब्राह्मण साम्राज्य का समर्थन करने के उद्देश्य में ही प्रतिपादित किया था ।
मनु के अनुसार- ‘बालक राजा का भी अपमान नहीं करना चाहिये क्योंकि वह मनुष्य रूप में स्थित महान् देवता होता है ।’ किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि शासक निरंकुश होता था । व्यवहार में वह धर्म एवं व्यवहार के अनुसार ही शासन करता था । मनु ने प्रजापालन एवं प्रजारक्षण को राजा का सर्वश्रेष्ठ धर्म घोषित किया है ।
साम्राज्य के विभिन्न भागों में राजकुमार अथवा राजकुल के सम्बन्धित व्यक्तियों को राज्यपाल नियुक्त करने की परम्परा चलती रही । वायुपुराण में कहा गया है कि पुष्यमित्र ने अपने पुत्रों को साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में सह-शासक नियुक्त कर रखा था ।
मालविकाग्निमित्र से पता चलता है कि उसका पुत्र अग्निमित्र विदिशा का उपराजा था । अयोध्या-लेख के अनुसार धनदेव कोशल का राज्यपाल था । वसुमित्र के उदाहरण से स्पष्ट है कि राजकुमार सेना का संचालन भी करते थे । मालविकाग्निमित्र में ‘अमात्य-परिषद्’ तथा महाभाष्य में ‘सभा’ का उल्लेख हुआ है । यह मौर्यकालीन मंत्रिपरिषद थी । इससे स्पष्ट है कि शासन में सहायता प्रदान करने के निमित्त एक मन्त्रिपरिषद् भी होती थी ।
कौटिल्य के समान मनु ने भी मन्त्रिपरिषद् की आवश्यकता पर बल देते हुए लिखा है कि- ‘सरल कार्य भी एक मनुष्य के लिये कठिन होता है । विशेषकर महान् फल देने वाला राज्य अकेले राजा के द्वारा कैसे चलाया जा सकता है ।’
मनु के अनुसार राजा को सात या आठ मन्त्रियों की नियुक्ति करना चाहिये । मनुस्मृति से शुंगकाल के सुविकसित न्याय तथा स्थानीय प्रशासन की भी जानकारी हो जाती है । इस समय भी ग्राम शासन की सबसे छोटी इकाई होते थे ।
ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय तक आते-आते मौर्य-कालीन केन्दीय नियन्त्रण में शिथिलता आ गयी थी तथा सामन्तीकरण की प्रवृत्ति सक्रिय होने लगी थीं ।
शुंग काल में यद्यपि पाटलिपुत्र राजधानी थी तथापि ऐसा प्रतीत होता है कि विदिशा का राजनैतिक तथा सांस्कृतिक महत्व बढ़ता जा रहा था । कालान्तर में इस नगर ने पाटलिपुत्र का स्थान ग्रहण कर लिया ।
अश्वमेध यज्ञ:
अपनी उपलब्धियों में फलस्वरूप पुष्यमित्र उत्तर भारत का एकच्छत्र सम्राट बन गया । अपनी प्रभुसत्ता घोषित करने के लिये उसने अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया । पतंजलि ने महाभाष्य में वर्तमान लट्लकार के उदाहरण में बताया है- ‘इह पुष्यमिंत्र याजयाम:’ अर्थात् यहाँ हम पुष्यमित्र के लिये यज्ञ करते हैं ।
अयोध्या अभिलेख में पुष्यमित्र को ‘दो अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला (द्विरश्वमेधयाजिन:) कहा गया है । ऐसा प्रतीत होता है कि जब उसने राजधानी में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली होगी तो उसने प्रथम यज्ञ किया होगा ।
दूसरा यज्ञ उसके शासन के अन्त में किया गया होगा । सम्भवत: इसी का उल्लेख मालविकाग्निमित्र में हुआ है । हरिवंश पुराण में कहा गया है कि- ‘कलियुग में एक औद्भिज्ज (नवोदित) काश्यप गोत्रीय द्विज सेनानी अश्वमेध यज्ञ का पुनरुद्धार करेगा ।’
धार्मिक नीति:
बौद्धग्रन्थ दिव्यावदान तथा तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के विवरणों में पुष्यमित्र शुंग को बौद्धों का घोर शत्रु तथा स्तूपों और विहारों का विनाशक बताया गया है । दिव्यावदान से पता चलता है कि- ‘उसने लोगों से अशोक की प्रसिद्धि का कारण पूछा । इस पर उसे ज्ञात हुआ कि अशोक 84,000 स्तूपों का निर्माता होने के कारण ही प्रसिद्ध है । परिणामस्वरूप उसने 84,000 स्तूपों को विनष्ट करके प्रसिद्धि प्राप्त करने का निश्चय किया ।’
अपने ब्राह्मण पुरोहित की राय पर पुष्यमित्र ने महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं को समाप्त करने की प्रतिज्ञा की । वह पाटलिपुत्र स्थित कुक्कुटाराम के महाविहार को नष्ट करने के लिये गया परन्तु एक गर्जन सुनकर भयभीत हो गया और लौट आया ।
तत्पश्चात् एक चतुरंगिणी सेना के साथ मार्ग में स्तूपों को नष्ट करता हुआ, विहारों को जलाता हुआ तथा भिक्षुओं की हत्या करता हुआ वह शाकल पहुँचा । वहाँ उसने यह घोषणा की कि- ‘जो मुझे एक भिक्षु का सिर देगा उसे मैं 100 दीनारें दूँगा ।’
तारानाथ ने भी इसकी पुष्टि की है । क्षेमेन्द्रकृत ‘अवदानकल्पलता’ में भी पुष्यमित्र का चित्रण बौद्ध धर्म के संहारक के रूप में किया गया है । परन्तु बौद्ध लेखकों में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने तथा अबौद्धों के अपकार्यों का काल्पनिक विवरण देने की प्रवृत्ति पायी जाती है ।
हम यह देख चुके हैं कि किस प्रकार अशोक के पूर्व बौद्धकालीन जीवन के विषय में भी ये ग्रन्थ निरर्थक वृत्तान्त प्रस्तुत करते हैं । अत: इन पर विशेष विश्वास नहीं किया जाना चाहिये । शुंगों के समय की साँची तथा भरहुत से प्राप्त कलाकृतियों के आधार पर पुष्यमित्र के बौद्ध-द्रोही होने का मत स्पष्टतः खण्डित हो जाता है ।
भरहुत की एक वेष्टिनी पर ‘सुगनंरजे….’ (शुंगों के राज्य-काल में) खुदा हुआ है । इससे शुंगों की धार्मिक सहिष्णुता का परिचय मिलता है । इस समय साँची तथा भरहुत के स्तूप न केवल सुरक्षित रहे, अपितु राजकीय तथा व्यक्तिगत सहायता भी प्राप्त करते रहे ।
कुछ विद्वानों ने यह मत रखा है कि साँची तथा भरहुत की कलाकृतियों का निर्माण पुष्यमित्र के उत्तराधिकारी शासकों ने करवाया था तथा इनसे उसकी धार्मिक सहिष्णुता सिद्ध नहीं की जा सकती ।
प्रयाग विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष जी. आर. शर्मा ने बताया है कि कौशाम्बी स्थित घोषिताराम विहार में विनाश तथा जलाये जाने के चिह्न प्राप्त होते हैं जो पुष्यमित्र शुंग की असहिष्णुता के ही परिचायक हैं ।
इसके विपरीत सुप्रसिद्ध कलाविद् हेवेल का विचार है कि- ‘साँची तथा भरहुत के तोरणों का निर्माण दीर्घकालीन प्रयासों का परिणाम था जिसमें कम से कम 100 वर्षों से भी अधिक समय लगा होगा ।’
अत: हम पुष्यमित्र को अलग करके केवल उसके उत्तराधिकारियों के काल में उनके निर्माण की कल्पना नहीं कर सकते । यद्यपि इस विषय में हम निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कह सकते तथापि ऐसा प्रतीत होता है कि पुष्यमित्र द्वारा बौद्ध सम्राट की हत्या तथा ब्राह्मण धर्म को राज्याश्रय प्रदान करने के कार्यों से बौद्ध मतानुयायियों को गहरी वेदना हुई ।
संभव है कुछ बौद्ध भिक्षु शाकल में यवनों से जा मिले हों तथा उन्हीं देश-द्रोहियों का वध करने वालों को पुरस्कार देने की घोषणा पुष्यमित्र द्वारा की गयी हो । अत: साम्राज्य की सुरक्षा की दृष्टि से बौद्ध भिक्षुओं को दण्ड देना तत्कालीन समय की एक महती आवश्यकता थी ।
इस प्रकार, बौद्ध धर्म के साथ कठोर व्यवहार उसके यवनों के साथ सम्बन्धित होने के कारण ही हुआ । केवल इसी आधार पर हम पुष्यमित्र को बौद्ध द्रोही नहीं मान सकते ।
स्वयं दिव्यावदान का कथन है कि पुष्यमित्र ने कुछ बौद्धों को अपना मन्त्री नियुक्त कर रखा था । पुराणों के अनुसार पुष्यमित्र ने 36 वर्षों तक राज्य किया । अत: उसका शासन काल सामान्यतः 184 ईसा पूर्व से 148 ईसा पूर्व तक माना जा सकता है ।
क्रमशः .......

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