बढ़ती बलात्कार की घटनाएं ,मरती मानवीय संवेदनाएं ,जिम्मेदार कौन?


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देवानंद नायक
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भारतीय संघ के हर सूबे में प्रतिदिन बलात्कार ,छेड़छाड़ व यौनहिंसा की घटना घटित हो रही है और अब यह घटनाएं इतना विकराल रूप लेती जा रही है कि अब न सिर्फ शारीरिक व मानसिक बलात्कार किया जा रहा है बरन अब हत्या भी कर दी जाती है और इसका शिकार न सिर्फ महिलाएं और युवतियां हैं बल्कि छोटी छोटी बच्ची भी अब इन हवस के भूखे भेडियो का शिकार बन रही है
हमारे देश मे पिछले एक दशक में यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों में बहुत तेजी से बृद्धि हुई है न सिर्फ महिलाएं, लड़कियों को इसका शिकार बनाया जा रहा है बल्कि किशोर बालक भी कदाचित यौनाचार के शिकार बन रहे हैं !
आखिर ऐसा क्या हुआ जो देश मे इस तरह के अपराधों को सह मिल रही है या बढ़ावा मिल रहा है ,इसके लिए कौन जिम्मेदार है भारतीय समाज को सभ्य समाज माना जाता है फिर इसमें ऐसी दरिन्दगी कहाँ से आई यह विचारणीय प्रश्न है ?
भारत मे टेलीविजन चैनलों के बेलगाम होने के कारण भी यौन अपराध बढ़े हैं आज किसी भी टीवी चैनल पर किसी भी धारावाहिक में आप देख सकते हैं किस वेशर्मी से अंतरंग संबधो को दिखाया जाता है , किस तरह सुहागरात जैसे दृश्य दिखाकर उत्तेजनाओं को भड़काया जाता है क्या यह दृश्य बच्चों दर्शको को मानसिक रूप से प्रभावित नहीं करते हैं बिग बॉस जैसे सीरियल तो नंगा नाच दिखा कर अपनी टीआरपी के नाम पर देश को बर्बाद कर रहे हैं फिल्मों में एक जमाना वह हुआ करता था जब किसी हीरोइन के कंधे पर यदि दुप्पटा भी नही होता था वह दृश्य दिखाने की अनुमति सेंसर बोर्ड नही देता था आज सेंसर बोर्ड के नाम पर सिर्फ ढकोसला शेष बचा है आज फिल्मे फूहड़ता व अश्लीलता परोस रही है किस तरह आज फिल्मों में द्विअर्थी शब्दो का इस्तेमाल किया जाता है किसी से छिपा नही है ,आइटम नम्बर के नाम पर अश्लीलताओं का अंबार लगा दिया है आप अपने दिल पर हाथ रख कर खुद से सवाल कीजिये क्या आज की फिल्में आप अपने माँ बाप और बच्चों के साथ बैठकर देखने लायक मानते हैं विज्ञापन और पत्र - पत्रिकाएं आज जिस तरह के दृश्य प्रकाशित कर दिया करते हैं उससे नहीं लगता कि मानवीय संवेदना तनिक भी जीवित बची है विज्ञापन चाहे वह टीवी पर हो चाहे पत्र- पत्रिकाओं में अश्लीलता की दुकान खोल रखी है यह सब मिलकर दिन रात इंसान की यौन उत्तेजना को भड़काने का कार्य कर रहे हैं मोबाइल व इंटरनेट का उपयोग लगभग हर घर मे हो रहा है क्या हम जानते हैं इसका सदुपयोग कितना हो रहा है या सिर्फ व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से ज्ञान प्राप्त कर फेसबुक पर ज्ञान बांटने में व्यस्त है इन मोबाइल फोन व इंटरनेट माध्यमों से भी अनेक प्रकार से फूहड़ता फैलने के साथ गलत रास्ते पर ले जाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं क्राइम सीरियल आज कल लगभग हर चैनल पर इस तरह प्रसारित किए जा रहे हैं जिससे बहुत बड़ा देश हित होने जा रहा है बल्कि इन सीरियलों द्वारा क्राइम करने के नए नए तरीके सिखाये जा रहे हैं और आश्चर्य की बात है यह सीरियल बढ़े लोकप्रिय है और हर घर मे देखे जाते हैं
हम देखते हैं इन सब माध्यमो के अलावा भी कई और माध्यम भी है जो दिन रात फूहड़ता परोसने में लगे रहते हैं आजकल लाफ्टर के नाम पर भी फूहड़ता फैलाई जाती है जब हर जगह और हर समय मनुष्य की उत्तेजना को भड़काया जाएगा तो उसके मानसिकता पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है और इस तरह उत्तेजित मनुष्य यौन हिंसा पर उतर आते है यह अपनी हवस मिटाने के लिये न सिर्फ महिलाओं बल्कि दुधमुंही बच्चियों को भी अपनी हवस का शिकार बना डालते हैं यह अपराध इक तरफा नही बचा है कभी कभार ऐसे मामले भी सामने आ जाते हैं जब किसी महिला के द्वारा युवक या बच्चों के शोषण की बात सामने आती है हालांकि यह मामले अभी कम है अगर यह स्तिथि रही तो इस तरह के अपराधों के भी बढ़ने की आशंका है
हमारे देश की सरकारें पता नही कब कुम्भकर्णी निद्रा से जागेगी और इन समाज मे सभ्यता का भक्षण करने बाले राक्षसों पर लगाम लगाएंगी मेरा निजी विचार तो यह है कि अब घर मे टीवी देखना और रखना अपने बच्चों को गलत रास्ते पर ले जाने का सबसे अच्छा माध्यम है अगर इससे बचना है तो टीवी पर लगाम लगाओ व बच्चों के मोबाइल फोन पर नजर रखो

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