लेखक : देवानन्द नायक
मगध में नन्द साम्राज्य के पतन के पश्चात चाणक्य के मार्गदर्शन में चंद्रगुप्त के नेतृत्व में शक्तिशाली ,बैभवशाली मौर्य साम्राज्य का अभ्युदय हुआ
मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत सम्पूर्ण जम्बूद्वीप को एक मौर्य पताका के तले लाया गया चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा अपने जीवन के अंतिम क्षणों में सन्यास लेकर एक जैन सन्यासी के में दक्षिण भारत में अपना जीवन बिताया चंद्रगुप्त के बाद उसके उत्तराधिकारियों ने मौर्य वंश के वैभवशाली साम्राज्य को सही तरीके से संचालन और राज्य सीमाओं की रक्षा में असमर्थ रहे सम्राट अशोक के काल मे मौर्य वंश की कीर्ति पताका पुनः फहराई किन्तु कुछ ऐतिहासिक गलतियों के चलते मौर्य वंश के पतन की नींव डाल दी कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध भिक्षुओं के सामने धम्म दीक्षा ली और बाद में बौद्ध धम्म को राजधर्म घोषित कर दिया राज कोष का इस्तेमाल धम्म प्रचार में किया जाने लगा अहिंसा के चलते सैन्य शक्ति खत्म या सीमित कर दी जिससे आगे चलकर मौर्य साम्राज्य के अधीन रहने वाले तमाम सामंत , छोटे राज्य स्वतंत्र राज्यो के रुप में सामने आए
आगे चलकर कमजोर होते मौर्य साम्राज्य में अनेक प्रकार की विसंगतियां पैदा होती चली गई देश मे अराजकता का माहौल बन गया उस समय अशोक का पौत्र ब्रहद्रथ मौर्य साम्राज्य का प्रमुख था देश मे तमाम विदेशी षड्यंत्र होने लगे बौध्द मठो में विदेशियों के षड्यंत्र रचे जाने लगे , मठ विदेशियों के पनाहगार बन गए जब इस ओर सम्राट बृहद्रथ का ध्यान नही गया तब सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उन्हें इस बात से अवगत करा कर उनसे कार्यवाही की अनुमति मांगी किन्तु अयोग्य सम्राट बृहद्रथ दूरगामी संकट को समझने में असमर्थ था और बौद्ध मठों में शरण पाए षडयंत्रकारियो पर कार्यवाही करने से मना कर दिया ,किन्तु प्रजा में बढ़ते असन्तुष्ट और राष्ट्र को खतरे में देख सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने बौद्ध मठों में छिपे षडयंत्रकारियो पर सीधी कार्यवाही कर दी
जिसके बाद राजदरबार में सम्राट बृहद्रथ व सेनापति पुष्यमित्र शुंग के तीखी बहस के बस पुष्यमित्र शुंग ने यह कहते हुए कि "ब्राह्मण किसी से अनुमति नही लेता" सम्राट बृहद्रथ की गर्दन धड़ से अलग कर दी ,कुछ पलों के लिए दरबार मे खामोशी के बाद "सम्राट पुष्यमित्र शुंग की जय"का जयघोष गूंजने लगा , सम्राट पुष्यमित्र शुंग ने मगध के राज्य सिंहासन पर आसीन होते ही छद्म बौद्ध भिक्षुओं के रूप में षडयंत्रकारियो को मारने व षड्यंत्रकारी मठो को नष्ट करने हेतु सेना को आदेश दिया और जो इन षडयंत्रकारियो की गर्दन काट कर लाएगा उसे 100 स्वर्णमुद्राएँ उपहार स्वरूप भेंट करने की घोषणा की आज के नवबौद्ध और राजनैतिक बौद्ध द्वारा उनके साहित्य में यह पढ़ाया जाता है कि वह बौद्ध धम्म विरोधी थे किंतु यह अर्ध सत्य है क्योंकि सम्राट पुष्यमित्र शुंग ने नकली और षडयंत्रकारी बौद्धों के विरुद्ध ही आंदोलन चलाया था जो वास्तविक बौद्ध थे उन्हें सम्राट ने सम्मान दिया पुष्यमित्र शुंग ने खजुराहो में बौद्ध बिहार का निर्माण भी करवाया
(शेष गतांक से ....)


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