डॉ भीमराव रामजी अम्बेड़कर का नाम किसी परिचय का मोहताज नही है भले ही भारत की आजादी की लड़ाई में उनका योगदान स्पष्ट तौर पर कम ही देखने को मिलता हो, किन्तु वह एक सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाले महायोद्धा के रूप में भारतीय इतिहास में दर्ज हैं वह उन सामाजिक कुरीतियों से आजीवन लड़ते रहे जिन्हें सनातन संस्कृति में मुगलिया शासनकाल में उत्पन्न हुई या उन्हें उत्पन्न किया गया जिनमे जिसमे अस्पर्शता ,सामाजिक भेदभाव , नारी को गैरबराबरी का दर्जा आदि वैसे मुगलकाल में मैला ढोने की प्रथा , पर्दा प्रथा, सती प्रथा जैसी अनेक कुरीतियों का जन्म हुआ जिनके अनेक परिस्थिति जन्य कारण थे
डॉ अम्बेड़कर जिन्हें प्रायः बाबा साहेब कहा जाता है उनके अगर विचारों की बात करें तो वह आजके उनके अनुयायी के बिल्कुल इतर है
आज भारत मे बाबा साहब अम्बेड़कर को तीन विचारधाराओं का अगुआ या प्रर्वतक प्रचारित किया जा रहा है जिनमे एक संघ और उसके अनुसांगिक संगठनों द्वारा हिन्दूवादी ,दूसरे वामपंथी और कम्युनिस्ट संगठनों द्वारा अपनी विचारधारा का और तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण उनके उत्तराधिकारी होने का दम्भ भरने वाले लोगों द्वारा मूलनिवासीवादी और उनका मुख्य सिद्धान्त है की आर्य विदेशी है और हम मूलनिवासी.
बाबा साहब ,हिन्दू और हिन्दुराष्ट्र
डॉ अम्बेड़कर ने कहा 'मैं हिंदू धर्म में पैदा ज़रूर हुआ, लेकिन हिंदू रहते हुए मरूंगा नहीं.' 1935 में ही अंबेडकर ने इस वक्तव्य के साथ हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा कर दी थी. लेकिन, औपचारिक तौर पर कोई अन्य धर्म उस वक्त नहीं अपनाया था. अंबेडकर समझते थे कि यह सिर्फ उनके धर्मांतरण की नहीं बल्कि एक पूरे समाज की बात थी इसलिए उन्होंने सभी धर्मों के इतिहास को समझने और कई लेख लिखकर शोषित समाज को जाग्रत व आंदोलित करने का इरादा किया.
साल 1940 में अपने अध्ययन के आधार पर अंबेडकर ने द अनटचेबल्स में लिखा कि भारत में जिन्हें अछूत कहा जाता है, वो मूल रूप से बौद्ध धर्म के अनुयायी थे और ब्राह्मणों ने इसी कारण उनके साथ नफरत पाली. इस थ्योरी के बाद अंबेडकर ने 1944 में मद्रास में एक भाषण में कहा और साबित किया कि बौद्ध धर्म सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक और तर्क आधारित धर्म है. कुल मिलाकर बौद्ध धर्म के प्रति अंबेडकर का झुकाव और विश्वास बढ़ता रहा. आज़ादी के बाद संविधान सभा के प्रमुख बनने के बाद बौद्ध धर्म से जुड़े चिह्न अंबेडकर ने ही चुने थे.
डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘पाकिस्तान ऑर दी पार्टिशन आफ इण्डिया’ (1940) में चेताया था कि ‘‘अगर हिन्दू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा। हिन्दू कुछ भी कहें, हिन्दू धर्म स्वतन्त्रता, समता और बन्धुता के लिए खतरा है। उस आधार पर वह लोकतन्त्र के साथ मेल नहीं खाता है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।[1]” आंबेडकर के लिए हिंदू राष्ट्र का सीधा अर्थ द्विज वर्चस्व की स्थापना था
डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘प्राचीन भारत में क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति’ में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ‘सबसे पहले तो हमें यह तथ्य स्वीकार करना होगा कि भारत में साझी संस्कृति जैसी कोई चीज ही नहीं रही है। ऐतिहासिक रूप से यहाँ तीन भारत रहे हैं- ब्राह्मण भारत, बौद्ध भारत और हिन्दू भारत।’ इसी किताब में वे आगे कहते हैं कि मुसलमानों के आक्रमण से पहले ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धर्म के बीच तीखा संघर्ष चला।[2] इस संघर्ष में बौद्ध धर्म ने ब्राह्मण धर्म को पराजित कर दिया था। वे इसी किताब में लिखते हैं कि ‘अशोक ने बुद्ध धम्म को राजकीय धर्म घोषित कर दिया। सचमुच यह ब्राह्मणवाद के लिए बहुत बड़ा धक्का था। इससे ब्राह्मणों को राज्य का संरक्षण मिलना बन्द हो गया। अशोक साम्राज्य में उन्हें गौण या अधीनस्थों का दर्जा दिया जाने लगा और उनकी अवहेलना की जाने लगी। निःसन्देह कहा जा सकता है कि ब्राह्मण धर्म को दबा दिया गया, क्योंकि अशोक ने सभी पशुओं की बलि पर रोक लगा दी, जिस पर ब्राह्मणवाद टिका हुआ था। इस प्रकार ब्राह्मणों को न केवल राज्य का संरक्षण मिलना बन्द हो गया बल्कि उनका व्यवसाय भी छिन गया। यह व्यवसाय था, यज्ञ कर्म करना और उसके बदले में शुल्क लेना, जो बहुत अधिक होता था। इस प्रकार 140 वर्षों तक मौर्य साम्राज्य रहा और इस दौरान ब्राह्मण लोग दलित और दमित वर्गों की तरह रहे।’[3] फिर ब्राह्मणों ने साजिश रचना शुरू किया कि कैसे बौद्ध धम्म को पराजित करके ब्राह्मणों के वर्चस्व को फिर से कायम किया जाए। इस साजिश का वर्णन करते हुए बाबा साहब अपनी किताब ‘प्राचीन भारत में क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति’ में कहते हैं कि दुखी ब्राह्मणों के पास बौद्ध साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं था। यही विशेष कारण था, जिससे पुष्यमित्र ने मौर्य साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। पुष्यमित्र ‘शुंग’ गोत्र का था। शुंग लोग सामवेदी ब्राह्मण होते थे, जो पशुबलि और सोमबलि में विश्वास करते थे। इसलिए समूचे मौर्य साम्राज्य में पशुबलि निषिद्ध होने और अशोक द्वारा जगह-जगह शिलालेखों आदि पर उसकी घोषणा खुदवा देने से शुंगों को स्वाभाविक तौर पर अनेक कष्ट भोगने पड़ रहे थे। पुष्यमित्र एक सामवेदी ब्राह्मण था, और अगर उसने ब्राह्मणों को ह्रास के लिए जिम्मेदार बौद्ध साम्राज्य को नष्ट कर ब्राह्मणों का उद्धार करने और उन्हें अपने धर्म के पालन की छूट देने का बीड़ा उठाया तो, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। पुष्यमित्र द्वारा की गयी राजहत्या का उद्देश्य राज्यधर्म के रूप में बुद्ध-धम्म को नष्ट करना और ब्राह्मणों को भारत का सम्प्रभु शासक बनाना था, जिससे राजा की राजनीतिक सत्ता की सहायता से बुद्ध धम्म पर ब्राह्मण धर्म की विजय हो सके।…. मौर्य साम्राज्य के विरुद्ध पुष्यमित्र ने जिस प्रतिक्रान्ति का सूत्रपात किया, उसका लक्ष्य बुद्ध धर्म का विनाश (अन्तिम मौर्य सम्राट वृहद्रथ की हत्या करके) और उसके स्थान पर ब्राह्मणवाद को स्थापित करना था, जो विधि संहिता के रूप में मनुस्मृति को अपनाये जाने के बारे में की गई उसकी घोषणा से स्पष्ट है। पुष्यमित्र की बुद्ध-धम्म के प्रति निर्दयता का अनुमान बौद्ध भिक्खुओं के विरुद्ध जारी उसकी घोषणा से लगाया जा सकता है। इस घोषणा में पुष्यमित्र ने हर बौद्ध भिक्खु के कटे हुए सिर की कीमत सौ स्वर्ण मुद्रायें निर्धारित की थीं।”[4]
डॉ. आंबेडकर को हिन्दू धर्म में अच्छाई नाम की कोई चीज नहीं दिखती थी, क्योंकि इसमें मनुष्यता या मानवता के लिए कोई जगह नहीं है। अपनी किताब ‘जाति का उच्छेद’ में उन्होंने दो टूक लिखा है कि ‘हिन्दू जिसे धर्म कहते हैं, वह कुछ और नहीं, आदर्शों और प्रतिबन्धों की भीड़ है। हिन्दू-धर्म वेदों व स्मृतियों, यज्ञ-कर्म, सामाजिक शिष्टाचार, राजनीतिक व्यवहार तथा शुद्धता के नियमों जैसे अनेक विषयों की खिचड़ी संग्रह मात्र है। हिन्दुओं का धर्म बस आदेशों और निषेधों की संहिता के रूप में ही मिलता है, और वास्तविक धर्म, जिसमें आध्यात्मिक सिद्धान्तों का विवेचन हो, जो वास्तव में सर्वजनीन और विश्व के सभी समुदायों के लिए हर काम में उपयोगी हो, हिन्दुओं में पाया ही नहीं जाता और यदि कुछ थोड़े से सिद्धान्त पाये भी जाते हैं तो हिन्दुओं के जीवन में उनकी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं पायी जाती। हिन्दुओं का धर्म ‘‘आदेशों और निषेधों” का ही धर्म है।[5] बाबा साहेब हिन्दुओं की पूरी व्यवस्था को ही घृणा के योग्य मानते हैं। उन्होंने लिखा कि ‘‘इस प्रकार यह पूरी व्यवस्था ही अत्यन्त घृणास्पद है, हिन्दुओं का पुरोहित वर्ग (ब्राह्मण) एक ऐसा परजीवी कीड़ा है, जिसे विधाता ने जनता का मानसिक और चारित्रिक शोषण करने के लिए पैदा किया है… ब्राह्मणवाद के जहर ने हिन्दू-समाज को बर्बाद किया है।” बाबा साहेब ने इसी किताब में बिना किसी भय के स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ‘‘यदि मुसलमान क्रूर थे तो हिन्दू नीच रहे हैं और नीचता, क्रूरता से भी बदतर गुण होता है।”[6]
वामपंथ ,कम्युनिज्म और अम्बेड़कर
आंबेडकर की दृष्टि में वामपंथ को देखें तो वे वामपंथ विचारधारा को संसदीय लोकतंत्र के विरुद्ध मानते थे. 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में बोलते हुए आंबेडकर ने कहा था, ‘वामपंथी इसलिए इस संविधान को नहीं मानेंगे क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र के अनुरूप है और वामपंथी संसदीय लोकतंत्र को मानते नही हैं.’ यह आश्चर्य है कि वामपंथी भी अपने नारों में आंबेडकर को जगह देने लगे हैं.
वहीं कांग्रेस भी अब आंबेडकर के प्रति अत्यंत उदार और विनम्र दिखने लगी है. कांग्रेस जिसने पहले आम चुनाव में तथा उसके ठीक बाद हुए उपचुनाव में आंबेडकर का विरोध किया था. उस दौर के कांग्रेसी यह चर्चा चलाते थे कि आंबेडकर के साथ तो दलित भी नहीं हैं. कांग्रेस का विरोध हुआ कि आंबेडकर दोनों चुनाव नहीं जीत सके. इसी कांग्रेस की पहली सरकार से आंबेडकर ने इस्तीफ़ा दिया था. आंबेडकर ने अनुच्छेद 370 पर वही रुख रखा जो तब जनसंघ का रुख हुआ करता था. इतना ही नहीं कम से कम कांग्रेस के लिए अगर आंबेडकर आज इतने महान हो गये हैं, तो उन्हें बताना चाहिए कि आखिर क्यों आंबेडकर को भारत रत्न के लिए चालीस वर्ष का इन्तजार करना पड़ा ? आंबेडकर इंदिरा गांधी से तो वरिष्ठ थे, उनसे पहले तो अंबेडकर को भारत रत्न मिलना चाहिए था!
सेक्युलरिज्म के प्रति भी आंबेडकर का आकर्षण भारत के नव-प्रगतिशीलों की तरह नहीं रहा. वे संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे. सेक्युलरिज़म शब्द की जरूरत संविधान में अंबेडकर को तब भी नहीं महसूस हुई थी, जबकि उस दौरान देश एक मजहबी बंटवारे से गुजर रहा था. यह शब्द आगे चलकर आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने 43वें संशोधन से जोड़ दिया.
अम्बेड़कर ,मूलनिवासीवाद और नकली अनुयायी
डॉ आंबेडकर को न तो दक्षिणपंथी कहा जा सकता है न वामपंथी ,उनकी अपनी स्वतंत्र विचारधारा रही है आजादी के पश्चात देश मे बने तमाम राजनीतिक व सामाजिक संगठन जो अम्बेडकरवादी होने का दम भरते हैं वह अधिकांशतः अंबडेकर की विचारधारा से इतेफाक नही रखते हैं बल्कि उनके विपरीत दिशा में कार्य करते हैं आज तमाम तथाकथित अम्बेड़करवादी संगठन और नेता यह दुष्प्रचार कर रहे हैं कि वह यानी अनुसूचित जाति समाज उनकी भाषा मे दलित समाज मूलनिवासी है और तथाकथित उच्च जाति के लोग यानि आर्य विदेशी है यह विचार उतना ही बड़ा झूठ है जितना सच हिमालय का अस्तित्व ,यह विचार अम्बेडकरवाद के बिल्कुल विपरीत है क्योंकि डॉ अम्बेड़कर का मानना था शुद्र आर्य हैं और वह भारत के ही मूलनिवासी है इस विषय पर उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी जिसमें उन्होंने इस बात का उदाहरण सहित विस्तार से वर्णन किया है यह पुस्तक है "शुद्र कौन थे" (हू वाज शुद्रा)
दूसरी बात डॉ आंबेडकर ब्राह्मणवाद के प्रखर विरोधी थे यहाँ ब्राह्मण शब्द जातिसूचक नही बल्कि व्यवस्था सूचक है ब्राह्मणवादी व्यवस्था मूर्तिपूजा ,मंदिर इन चीजों से असहमत डॉ आंबेडकर थे आज उनके अनुयायी उनकी मूर्ति स्थापित कर नवीन ब्राह्मणवादी व्यवस्था का सृजन कर रहे हैं जिसमे शोषित भी दलित हैं और शोषक भी .
आज तमाम तथाकथित अम्बेड़करवादी "जय भीम और जय मीम" का नारा लगा रहे हैं लेकिन वह शायद इस बारे में डॉ अम्बेड़कर के विचारों से अनभिज्ञ है या वह भोलेभाले दलितों को वेवकूफ बनाने में व्यस्त हैं
बाबा साहेब ने इस्लाम अथवा मुस्लिम राजनीति के सन्दर्भ में अपने विचार "पाकिस्तान एंड द पार्टीशन आफ इंडिया" (1940, 1945 एवं 1946 का संस्करण) में विस्तार से प्रकट किए। डा. अम्बेडकर ने भारत पर मुसलमानों के क्रूर तथा रक्तरंजित आक्रमणों का गहराई से अध्ययन किया था। उन्होंने मोहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, मोहम्मद गोरी, चंगेज खां, बाबर, नादिरशाह तथा अहमद शाह अब्दाली के अत्याचारों का भी वर्णन किया।
डा. अम्बेडकर ने उन चाटुकारों तथा दिशाभ्रमित वामपंथी इतिहासकारों को फटकारते हुए लिखा कि “यह कहना गलत है कि ये सभी आक्रमणकारी केवल लूट या विजय के उद्देश्य से आए थे”।
डा.अम्बेडकर ने अनेक उदाहरण देते हुए बताया कि इनका उद्देश्य हिन्दुओं में मूर्ति पूजा तथा बहुदेववाद की भावना को नष्ट कर भारत में इस्लाम की स्थापना करना था। इस सन्दर्भ में उन्होंने कुतुबुद्दीन ऐबक, अलाउद्दीन खिलजी, फिरोज तुगलक, शाहजहां तथा औरंगजेब की विस्तार से चर्चा की है।
डा.अम्बेडकर ने साफ साफ बताया कि "इस्लाम विश्व को दो भागों में बांटता है, जिन्हें वे दारुल-इस्लाम तथा दारुल हरब मानते हैं। जिस देश में मुस्लिम शासक है वह दारुल इस्लाम की श्रेणी में आता है। लेकिन जिस किसी भी देश में जहां मुसलमान रहते हैं परन्तु उनका राज्य नहीं है, वह दारुल-हरब होगा। इस दृष्टि से उनके लिए भारत दारुल हरब है। इसी भांति वे मानवमात्र के भ्रातृत्व में विश्वास नहीं करते"।
डा. अम्बेडकर के शब्दों में- "इस्लाम का भ्रातृत्व सिद्धांत मानव जाति का भ्रातृत्व नहीं है। यह मुसलमानों तक सीमित भाईचारा है। समुदाय के बाहर वालों के लिए उनके पास शत्रुता व तिरस्कार के सिवाय कुछ भी नहीं है।"
उनके अनुसार “इस्लाम एक सच्चे मुसलमान को कभी भी भारत की अपनी मातृभूमि मानने की स्वीकृति नहीं देगा। मुसलमानों की भारत को दारुल इस्लाम बनाने के महत्ती आकांक्षा रही है”।
अंबेडकर ने इस्लाम और इसाईयत को विदेशी मजहब माना है। वह धर्म के बिना जीवन का अस्तित्व नही मानते थे, लेकिन धर्म भी उनको भारतीय संस्कृति के अनुकूल स्वीकार्य था। इसी वजह से उन्होंने ईसाईयों और इस्लाम के मौलवियों का आग्रह ठुकरा कर बौद्ध धर्म अपनाया क्योंकि बौद्ध भारत की संस्कृति से निकला एक धर्म है।
संदर्भ :
[1] पाकिस्तान और दी पार्टिशन आफ इण्डिया, पृ.338
[2] प्राचीन भारत में क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति, पृ. 154
[3] प्राचीन भारत में क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति, पृ. 165।
[4] प्राचीन भारत में क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति, पृ. 157।
[5] प्राचीन भारत में क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति, पृ. 182अन्याय


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