लेखक : देवानन्द नायक@ 9713989417
जब भी हमारे सामने धर्म की बात आती है तब जेहन में हिन्दू मुस्लिम जैसी बातें आती है यह स्वाभाविक है क्योंकि हमें धर्म का अर्थ सम्प्रदाय ही बताया गया है और आज कल सम्प्रदाय और मजहब के नाम पर आतंक और कट्टरता फैलाना ही धार्मिक होना है जो जितना कट्टर वह उतना धार्मिक
हमारे देश मे मत ,पंथ सम्प्रदाय के नाम पर व्यावसायिक समूह का निर्माण व राजनीतिक उद्देश्य के लिए धर्म की नई ब्याख्याये गढ़ना नई बात नही है
आज देश मे धर्म शब्द और अर्थ को लेकर किंकर्तव्यविमूढ़ होना सामान्य बात है क्योकि जिनके ऊपर यह जिम्मेदारी थी उन्होंने ईश्वर दैवीय शक्ति को अपने जीवकोपार्जन व धन अर्जन का साधन बना दिया और अनाचार और अधर्म व अमानवता का अपना साम्राज्य खड़ा कर मानव मात्र को भ्रमित करने का कार्य किया है
प्राचीन भारतीय सनातन परंपरा में राजा का धर्म अर्थात राज्य के प्रति कर्तव्य ,पिता का धर्म अर्थात संतान के प्रति पिता की जिम्मेदारी ,पत्नी धर्म यानी पति के प्रति जिम्मेदारी या कर्तव्य पुत्र धर्म अर्थात माता-पिता के प्रति कर्तव्य अतः यह स्पष्ट है कि धर्म का अर्थ कर्तव्य या जिम्मेदारी से है किंतु आज धर्म का अर्थ एक पूजा पद्धति को मानने वालों की कट्टरता से लगाया जा रहा है
प्राचीन काल मे सनातन परंपरा में अनेक मत पंथ थे (आज भी है जिन्हें संयुक्त रूप से हिन्दू नाम दिया गया है) जिनमे शैव ,वैष्णव ,शाक्त सम्प्रदाय प्रमुख थे किंतु मानव कल्याण सबके मूल में था
सनातन परंपरा में मानव जीवन का उद्देश्य क्रमशः धर्म ,अर्थ ,काम,मोक्ष की प्राप्ति है जिनमे धर्म को प्रथम स्थान पर रख गया है योगिराज श्रीकृष्ण ने भगवत गीता में कर्म को मुक्ति मार्ग बताते हुए अपने धर्म (कर्तव्य)अनुसार निष्कामभाव से कर्म को करते हुए उससे ईश्वर को समर्पित करने का उपदेश दिया है
अठारह पुराणों के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास ने कहा परोपकारः पुण्यदाय पापाय परपीड़नम अर्थात परोपकार पुण्य देने वाला है और दूसरों को पीड़ा पहुंचना पाप का कारण बनती है
रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं
परहित सरस् धर्म नही भाई ,परपीड़ा सम नही अधिमाई
दुसरो का हित करने से बड़ा कोई धर्म नही है और दूसरों को पीड़ा पहुंचने से बड़ा कोई अधर्म नही है
सरल भाषा मे हमे यह समझना चाहिए धर्म केवल पूजा पद्धिति नही है बल्कि एक जिम्मेदारी है जो कि हर व्यक्ति जो स्वयं को धार्मिक कहता है सबसे पहले धर्मानुसार कर्म करें और जिस किसी भी दिव्य देवता स्वरूप या महाशक्ति मातृशक्ति स्वरूप की पूजा उपासना करता है उनके उपदेश और दिखाए गए मार्ग अनुसार मानव जीवन के उद्देश्य धर्म ,अर्थ ,काम और तदन्तर मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयास करें

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