देवानंद नायक@9713989417
आज रामनवमी है , यह वह महापर्व है जब संसार मे मानवता व समाजवाद का उच्च आदर्श स्थपित करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जन्म हुआ था , श्री राम केवल सनातन परंपरा के उपासक देव ही नही है बरन भारतीय संस्कृति में उच्च मानवीय मूल्यों को व मर्यादा स्थापित कर लोककल्याणकारक व्यक्तित्व भी हैं वह न सिर्फ आदर्श राजा ,आदर्श पुत्र ,पिता ,पति, भाई व श्रेष्ठ योद्धा ,कुशल नीतिज्ञ ,कुशल प्रबंधक भी थे श्री राम के आदर्श और उनकी शिक्षाओं को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उपयोगी है
श्री रामचंद्र जी की सभी चेष्टाएं धर्म, ज्ञान, नीति, शिक्षा, गुण, प्रभाव, तत्व एवं रहस्य से भरी हुई हैं। उनका व्यवहार देवता, ऋषि, मुनि, मनुष्य, पक्षी, पशु आदि सभी के साथ ही प्रशंसनीय, अलौकिक और अतुलनीय है। देवता, ऋषि, मुनि और मनुष्यों की तो बात ही क्या-जाम्बवान, सुग्रीव, हनुमान आदि रीछ-वानर, जटायु आदि पक्षी तथा विभीषण आदि राक्षसों के साथ भी उनका ऐसा दयापूर्ण प्रेमयुक्त और त्यागमय व्यवहार हुआ है कि उसे स्मरण करने से ही रोमांच हो आता है। भगवान श्री राम की कोई भी चेष्टा ऐसी नहीं जो कल्याणकारी न हो। समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाले श्रीराम समाजवाद का प्राचीनतम व उच्च आदर्श पुरुष है निषादराज से मित्रता ,माता शबीरी के आश्रम में जाना और उनके हाथों से जूठे फल खाना ,केवट के साथ सम्बंध , बनवासी ,बंचितो पीड़ितों ,को साथ लेकर चलना उनके अंदर धर्म के लिए लड़ने व संसाधनों से विहीन होने पर भी कुशलतापुर्वक बानर व भालू व रीक्षो की मदद से एक वैभवशाली लंका साम्राज्य का अंत कर एक कुशल नेतृत्व का आदर्श प्रभु श्री राम ने प्रस्तुत किया है
राम जीवन मे केवल पूजा की मूर्ति मात्र नही वह जीवनपथ के सर्वोत्तम मार्गदर्शक है उनके आदर्शों पर चलते हुए जीवन को सफलतापूर्वक जीवन जीना चाहिये
न कि श्रीराम का नाम लेकर उन्माद फैलाना चाहिए राम तो वह व्यक्ति जिन्होंने कमजोर ,भील ,वनवासियों को साथ लेकर न सिर्फ उन्होंने उन्हें प्रोत्सहित किया बल्कि उन्हें उच्च योद्धा बनाया राम को जीवन मे धारण करो संसार को देखने का नजरिया बदल जायेगा राम से बड़ा मानववादी व समाजवादी आदर्श उदाहरण संसार मे नही मिलेगा
हिंदू संस्कृति के अनुसार भाइयों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार होना चाहिए इसकी शिक्षा हमें रामायण में श्रीराम, श्रीलक्ष्मण, श्रीभरत एवं श्रीशत्रुघन के चरित्रों से स्थान-स्थान पर मिलती है। उनकी प्रत्येक क्रिया में स्वार्थ त्याग और प्रेम का भाव झलक रहा है। श्रीराम और भरत के स्वार्थ त्याग की बात क्या कही जाए। श्री रामचंद्र जी का प्रत्येक संकेत, चेष्टा और प्रसन्नता भरत के राज्याभिषेक के लिए और भरत की श्री राम के राज्याभिषेक के लिए। इसी प्रकार द्वापरयुग में युधिष्ठिर आदि पांडवों का परस्पर भ्रातृप्रेम आदर्श और अनुकरणीय है।

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