लहार विधानसभा क्षेत्र : गोविन्द का गढ़ या नेतृत्वविहीन विपक्ष


🖋 देवानंद शर्मा "नायक"*
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लहार -  प्रदेश की सियासत में लहार विधानसभा का अलग ही  स्थान है यह कांग्रेस पार्टी के गढ़ के रूप में देखा जाता है  यहां से हरसेवक मिश्रा , रानी प्रेमकुमारी राजे , राघवराम चौधरी , रमाशंकर चौधरी और गोंबिद सिंह कुशवाह  कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे है लहार विधान सभा क्षेत्र को गोबिंद के गढ़ के रूप में देखा जाता है यह कितना सही है इसके लिए अतीत के गर्भ में जाना पड़ेगा
अस्सी के दशक में जनता पार्टी , लोकदल और जनता दल के रास्ते राजनीति का ककहरा  सीखने बाले युवा गोबिंद सिंह कुशवाह  ने उस समय संघर्स की राजनीति की और 1980 और 1985 के  विधानसभा चुनाव में किस्मत भी आजमायी किन्तु सफलता हाथ नही लगी इस बीच विभिन्न छोटे चुनाव में भी हाथ आजमाते रहे  जिनमें सफलताएं भी और अपने राजनितिक और कूटनीतिक दांव पेंच से लहार नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष पद पर काबिज होने में सफलता पाई अब 1990 के दशक आते आते लहार की राजनीति में तीन धुर्वीय हो चुकी थी  एक धड़ा था बीजेपी से 1985 में विधायक बने मथुरा प्रसाद महंत का ,दूसरा धड़ा उनसे चुनावी मात खाने बाले पूर्व मंत्री रमाशंकर चौधरी का और तीसरा धड़ा जनता दल के युवा नेता गोविंद सिंह कुशवाह का  1990 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नेता रमाशंकर चौधरी का टिकट काट कर पार्टी ने  युवा नेता दिनेश शुक्ला को टिकट दे दिया और बीजेपी के टिकट पर सिटिंग विधायक मथुरा महंत उम्मीवार थे और जनता दल के टिकट पर डॉ गोविन्द सिंह यही वह चुनाव था जिसके बाद गोबिंद सिंह यहां से लगातार चुनाव जीतते रहे इस चुनाव में रमाशंकर चौधरी अपने टिकट काटे जाने से नाराज थे ही और अपनी हार का बदला भी मथुरा महंत से लेना चाहते थे इसलिये उनका अप्रत्यक्ष समर्थन जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले गोविन्द सिंह को मिला और गोविन्द सिंह पहली मर्तबा जनता दल के टिकट पर विधायक बनकर भोपाल पहुंचे  लहार की राजनीती में बड़ा बदलाव जनता दल के विधायकों के कांग्रेस में विलय होने से देखने को मिला कल तक जो लहार कांग्रेस के सर्वेसर्वा थे वो लहार की राजनीती में अप्रसांगिक हो गए चाहे वो खिरिया बाले चौधरी हों या धरमपुरा के दिनेश शुक्ला
1993 के चुनाव में कांग्रेस ने सिटिंग  एम एल ए डॉ  गोविन्द सिंह को टिकट  देकर चौधरी और दिनेश शुक्ला के राजनितिक कैरियर पर ब्रेक लगा दिए  यहीं से लहार की राजनीति दो धुर्वीय हो गई  जिसमे सिटिंग विधायक गोविंद सिंह और पूर्व विधायक और  क्षेत्र के धनाढ्य परिवार में  से  आने वाले मथुराप्रसाद महंत मुख्य प्रतिद्वन्दी बन गए  यह स्तिथी 1998 के चुनाव तक देखने को मिली
2000 का दशक आते आते लहार के दो पूर्व मंत्रियो की राजनितिक महत्वकांक्षा हिलोरे मारने लगी लहार की राजनीती  की मुख्यधारा में वापसी के लिये पूर्व राजस्व मंत्री रमाशंकर चौधरी मप्र के बड़े दलित नेता फूल सिंह बरैया के साथ नजदीकी बढ़ाकर हाथी की सवारी करने की तैयारी करने लगे हालांकि इस विषय में कुछ सुत्रों की माने तो श्री चौधरी द्वारा फूल सिंह बरैया को  काफी दान दक्षिणा भी थी लेकिन उनका दांव उस समय उल्टा पड गया जब तक विधानसभा चुनाव आता उससे पूर्व मायावती ने बरैया को पार्टी से बहार का रास्ता दिखा दिया फिर मजबूरीवश चौधरी साहब को फूलसिंह बरैया की नई नवेली पार्टी समता समाज पार्टी के कुल्हाड़ी चिन्ह के साथ मैदान में आना पढ़ा
अब दूसरे पूर्व मंत्री रामशंकर सिंह की बात करते है तो 1977 में लहार से एम् एल ए रहे रमाशंकर सिंह अपने धनबल से बसपा का टिकट प्राप्त कर लहार क्षेत्र के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल रावतपुरा के संत रविशंकर के सहयोग से मैदान में उतरे  इस चुनाव में उन्हें गोविन्दसिंह के चिरप्रतिद्वंदी मथुरा प्रसाद महंत का भी सहयोग प्राप्त था 1980 के बाद यह पहला चुनाव था जब महंत परिवार चुनावी मैदान नही था और यह वह  चुनाव था जो किसी नेता के राजनितिक मेहनत और कार्य की जगह  गोविंद सिंह पक्ष और विपक्ष के बीच लड़ा गया 2003 के चुनाव में  बीजेपी ने कांग्रेसी पृष्ठभूमि से भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के माध्यम से चर्चा में आये युवा अम्बरीष शर्मा उर्फ़ गुड्डू को प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतरा लेकिन उमा लहार के बावजूद उन्हें 8610 बोटों से ही संतुष्ट होना पढ़ा  यहीं से लहार की राजनीति में यह ट्रेंड चल पढ़ा की पार्टी कोई मायने नही रखती यहां चुनाव सिर्फ गोविन्द सिंह विरोधी  वोटों से जीत जा सकता है और बीजेपी कमजोर होती चली गई  और 2008 के चुनाव में  बसपा से रोमेश महंत  चुनावी मैदान में उतरे और बीजेपी से विजौरा के त्रिपाठी परिवार की बहू और जिलापंचायत सदस्य मुन्नी त्रिपाठी को मैदान में उतारा लेकिन  उन्हें महज 2918 वोटों से  सन्तुष्ट होना पड़ा  इन दोनों चुनाव के बाद लहार की राजनीति में  पार्टीवाइज राजनीति  का कल्चर पूरी तरह ख़त्म हो कर गोविन्द विरोध के नाम पर विधायक बनने बाले नेताओ की राजनीतिक पौध  तैयार हो गयी जो सिर्फ विरोधी  वोटों की संजीवनी पाकर राजनितिक रूप से जीवित है  2013 के चुनाव में बीजेपी को फिर एक बार नया चेहरा तलाशना पढ़ा इस बार बीजेपी का चेहरा थे रौन से चार विधायक रहे बुगुर्ग नेता रसाल सिंह और बसपा से रोमेश महंत मैदान में थे रसाल सिंह के आभामण्डल में बीजेपी को लगभग 46900 वोट पाकर  सम्मानजनक बापसी हुई जो 1998 में मथुरा महंत के चहरे के रूप में प्राप्त हुई थी वर्ष 2018 के चुनाव में  बीजेपी ने पुनः रसाल सिंह पर दांव लगाया दस वर्ष से अधिक बसपा में समय  बिताने वाले युवा रोमेश महंत की वापसी भाजपा में हुई राजनीति में अप्रासंगिक हो चुके  रमाशंकर चौधरी को भी भजपा में लाया गया फिर भी परिणाम भाजपा के अनुकूल नही रहे बसपा के टिकट पर अम्बरीष शर्मा ने 32हजार  के लगभग आंकड़े तक पहुंचने में कामयाबी हासिल की और अपने कद में इजाफा किया किंतु आज 2023 के चुनाव सामने है लेकिन भाजपा के सामने यक्ष प्रश्न प्रत्याशी कौन होगा ? पुनः तालाश जारी है इस बार भाजपा में और अधिक दावेदार है लहार के किले को फतह करने के लिये भाजपा ने अपने रणनीतिकार पूर्व संगठन मंत्री व वर्तमान में दर्जा प्राप्त मंत्री आशुतोष तिवारी को लहार में  कमल खिलाने की तैयारी के साथ संगठन की चूले कसने को भेज दिया है अब  देखना यह है कि तिवारी  प्रत्याशी चयन और संगठन की मजबूती में क्या भूमिका निभाते हैं

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