💥दबोह -: *पत्रकार सुधांशु मुदगिल*
मध्यप्रदेश के भिण्ड जिले के एवं उत्तरप्रदेश की अंतिम सीमा सिरसागण के वीर मलखान की तपोभूमि दबोह क्षेत्र में शक्तिपीठ मां रणकौशला देवी पर नवरात्रि महोत्सव के चलते मां रणकौशला देवी के दर्शन करने पहुँच रहे हजारों की संख्या में श्रद्धालु,प्रातः ही भक्तों का मन्दिर पर आने का सिलसिला शुरू हो जाता है और देर रात्रि तक चलता रहता है अधिक जानकारी के लिए यहां बता दे प्राचीन समय से प्रसिद्ध स्थापित देवी मां की प्रतिमा सिद्ध मंदिर रेहकोला देवी के नाम से दूर दराज क्षेत्र में भी चर्चित हैं यहां मंदिर में आज भी भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं,मंदिर के पुजारी हलधर पंडा ने बताया कि शुल्क पक्ष की तेरस के दिन देवी मां की नवीन प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई,तभी से सभी श्रद्धालु शुल्क पक्ष की तेरस को मां रणकौशला माता का जन्मोत्सव भी बड़े घूम धाम से मनाते है,यहां नित्य मंदिर में सुबह के समय पूजा की सामग्री पुष्प आदि मंदिर में अर्पित मिलते है...!
*दिन में तीन रूपों में मां के होते है दर्शन*
यहां श्रद्धालुओं को माता रणकौशला देवी दिन में तीन रूपो में भक्तो को दर्शन देती हैं मां का सुबह के समय अलग रूप होता हैं मध्यावकाश के बाद अलग और संध्या में अलग रूप में भक्तो को दर्शन होते हैं जो भक्त सच्चे मन से माता से अर्जी लगातें हैं संकट हरने बाली मां उनकी मनोकामनाएं निश्चय ही पूरी करती हैं बीते वर्षों में मंदिर परिसर में यज्ञों का भी आयोजन किया जा चुका है...!
*माँ के मंदिर में अदृश्य शक्ति आज भी करती है देवी मां की पूजा*
रेहकोला देवी का मन्दिर 11वीं शताब्दी का बताया जाता है इसका निर्माण चन्देल राजाओं ने कराया था यहां माता की प्रतिमा की स्थापना आल्हा उदल के बड़े भाई सिरसा नरेश वीर मलखान एवं उनकी पत्नी गजमोतिन ने कराई थी मन्दिर परिसर से पूर्व दिशा में पांच किमी की दूरी पर पहूज(पुष्पावती) नदी के किनारे सिरसा की प्राचीन गढिय़ों के ध्वंसावशेष मिलते हैं बताया जाता है कि सिरसा गढ़ की बावड़ी से लेकर रेंहकोला देवी के मन्दिर तक पाँच किमी तक भूमिगत सुरंग भी है जिससे रोजाना मलखान अपनी पत्नी महारानी गजमोतिन के साथ बावड़ी में स्नान कर देवी मन्दिर में ब्रह्ममुहूर्त में देवी की पूजा-अर्चना करने आते है अंचल में मान्यता है कि मलखान आज भी सूक्ष्म शरीर से माता की पूजा अर्चना के लिए नित्य मंदिर में आया करते है कालांतर में सिरसा की बावड़ी में जल स्तर बढ़ जाने से मन्दिर के गर्भगृह की ओर जाने वाले दरवाजे जलमग्र होकर लुप्त हो गए हैं मन्दिर के गर्भगृह में देवी माँ की और मोहक स्वर्ण प्रतिमा है श्रद्धालुओं को कुदरती ही अपनी ओर आकर्षित कराती है...!
*मंदिर के कपाट खुलने से पहले ही हो जाती है माँ की पूजा*
इस मंदिर से एक बेहद आश्चर्यजनक बात जुड़ी हुई है कहा जाता है कि इस मंदिर में एक अदृश्य शक्ति आज भी पूजा करने आती है और सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्त में देवी माँ की पूजा ये शक्ति ही करती है शक्ति के उपासकों के लिए देवी का ये मंदिर बहुत महत्व रखता है रणकौशला देवी का मन्दिर हजारवीं शताब्दी का बताया जाता है इसका निर्माण चन्देल राजाओं ने कराया था और यहां देवी दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना आल्हा उदल के बड़े भाई सिरसा राज्य के सामन्त वीर मलखान एवं उनकी पतिव्रता पत्नी गजमोतिन ने की थी वीर मलखान देवी के बहुत बड़े भक्त थे...!
*मंदिर पास बाबड़ी के नीचे से बनी है सिरसा के लिये सुरंग*
मन्दिर से पूर्व दिशा में करीब 4 किमी दूर पहूज नदी है और इस नदी के किनारे सिरसा रियासत की प्राचीन गढियों के अवशेष भी मिले हैं। बताया जाता है कि सिरसा की गढ़ी की बावड़ी से लेकर रहकोला देवी के मन्दिर तक भूमिगत सुरंग है और इस सुरंग से ही उस समय वीर मलखान देवी की पूजा करने आते थे। मान्यता है कि आज भी देवी की पूजा करने इसी रास्ते से वीर मलखान आते हैं। वीर मलखान अपनी महारानी गजमोतिन के साथ बावड़ी में स्नान के बाद देवी मन्दिर में आज भी पूजा करने आते हैं क्योंकि रोज सुबह देवी के मंदिर के कपाट खुलने से पहले उनकी पूजा हुई नजर आती है। यही कारण है कि लोग मानते हैं कि ये अदृश्य शक्ति वीर मलखान ही हैं क्योंकि वह देवी के परम भक्त थे हालांकि, कालांतर में सिरसा की बावड़ी में जल स्तर बढ़ जाने से मन्दिर के गर्भगृह की ओर जाने वाले दरवाजे जलमग्र हो चुके हैं। मन्दिर के गर्भगृह में जगदम्बा दुर्गा बेदह मोहक आठ धातुओं से बनी प्रतिमा स्थापित है देवी सिद्धिदात्री मानी गईं और मान्यता है कि यहां यदि कोई भी मनोकामना लेकर आए वह जरूर पूरी होती है। मंदिर में पहुंचते ही आत्मिक शांति का अहसास होता है। इसलिए कहा जाता है कि इस मंदिर में देवी जागृत अवस्था में हैं। इसलिए यहां आने पर सभी के कष्ट दूर हो जाते हैं...!

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