भारत में हिंदी मातृभाषा में शिक्षा क्यों नहीं ?




राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जी ने कहा है कि " राष्ट्र भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है ।"  भारतवर्ष में  १४ सितंबर १९४९को संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई और हम प्रतिवर्ष १४ सितंबर को  हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं । पूरा महीना हिंदी को समर्पित होता है , बहुत सी कार्यशालाएं , गोष्ठियां , भाषण व लेखन गतिविधियां होती है । हिंदी के उत्थान और विकास के लिए बहुत से प्रण सरकार और जनता करती है तथा  हर रोज हिंदी पखवाड़ों से  संबंधित खबरें समाचार पत्र व पत्रिकाओं में छपती है , बड़े बड़े हिंदी महापुरुषों के साक्षात्कार हिंदी को लेकर होते हैं । केंद्र व राज्य सरकारें हिंदी में विशेष कार्य करने वाले कर्मियों व संस्थानों को पुरस्कृत भी करती है लेकिन फिर भी हिंदी मातृभाषा से संबंधित कुछ खास परिवर्तन देखने को नहीं मिलता । 
संविधान में उल्लेख है कि भारत की संघ सरकार हिंदी को आगे बढ़ाने का काम करेगी ये भाषाओं से संबंधित अनुच्छेद ३५१ में कहा गया है । भारत सरकार वास्तव में कर भी रही है । 
१९७७ में अटल बिहारी वाजपेई जी तत्कालीन  विदेश मंत्री ने सर्व प्रथम संयुक्त राष्ट्र संघ में अपना पहला भाषण हिंदी में देकर सबके ह्रदय पर प्रभाव छोड़ा था यह भाषण काफी लोकप्रिय हुआ । ये हम सभी भारतवासियों के लिए गौरवशाली क्षण था और यह पहला मौका था जब यूएन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतवर्ष और हिंदी का मान सम्मान बढ़ा । 
हमारे बहुत से समाज सुधार आंदोलनों एवं उनके प्रणेताओं का भी हिंदी के विकास के लिए अमूल्य योगदान रहा है । युग पुरुष स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने हिंदी को भारत की एकता का प्रतीक माना जाता और कहा है कि एक हिंदी ही है जिसके द्वारा संपूर्ण भारत वर्ष को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है । वहीं विनोबा भावे जैसे महान देशभक्त व भू आंदोलन के जनक ने तो कहा है कि मैं सचमुच में हिंदी भाषा का बहुत ऋणी हूं क्योंकि उसके बिना मेरी पदयात्रा भारत के हर देहात में संभव नहीं थी । 
हिंदी हमारी स्वाधीनता प्राप्ति की व इसके लिए किए गए प्रयासों , आंदोलनों एवं परस्पर संप्रेषण की भाषा रही है । हमारे देश की तस्वीर और तकदीर को बदलने में इस भाषा का अविस्मरणीय योगदान रहा है । चूंकि यह भाषा सरल है जैसे बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है । अंग्रेजी भाषा से मेरा कोई विरोध नहीं है इसकी भी अपनी विशेषताएं हैं और कुछ महापुरुष  , शिक्षाविद्  कहते हैं कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है और इसके बगैर सब कुछ अधूरा है । लेकिन मैं समझता हुं कि न ही यह अंतरराष्ट्रीय भाषा है और न ही इसके बगैर सब कुछ अधूरा है । इसके बिना सब कुछ हो सकता है । आज हिंदी इंटरनेट की मां बनने वाली हैं । हिंदी में एलगार्दिन साफ्टवेयर तैयार हो रहे हैं और कुछेक वर्षों में यह संपूर्ण रूप में इंटरनेट की भाषा के पद पर आसीन होगी ऐसी हम उम्मीद करते हैं । 
मैं कुछ अंग्रेजी के शब्दों को लेना चाहुंगा जो मैंने अध्ययन किया है जैसे एक तो अंग्रेजी में साइलेंट शब्द रूपी व्याधि है जैसे एक शब्द knife  है अब इसका उच्चारण हम कैसे करें । यदि इसे कनाइफ कहें तो बुद्धिजीवियों में उपहास का कारण बनूंगा वैसे एक शब्द है sun  और एक है son ऐसे तमाम शब्द है जो मेरी समझ से परे है । हो सकता है यहां  थोड़ा सा व्यंग्य अवश्य आया है लेकिन ये बातें विचारणीय है क्योंकि कि अंग्रेजी में शब्दों का अभाव रहता है और रहेगा यह बात सौ आने सही है । अब son  और sun को अंग्रेजी में सन् से ही उच्चारण करते हैं , वो पुत्र भी हो सकता है और दिनकर जी भी । इतना ही नहीं अंग्रेजी में uncle  है  अब चाहे  सगा ताया  , चाचा ,  फुफा हो या कोई अजनबी व्यक्ति सभी के लिए एक ही शब्द uncle का प्रयोग किया जाता है जबकि हमारी हिंदी में अलग-अलग नाम है जैसे चाचा , ताया , फूफा , मामाजी इत्यादि 
अंग्रेजी में शब्द है sun और moon इनके अंग्रेजी में कोई पर्यायवाची नहीं मिलते , इनको परिभाषा देकर ही व्यक्त करना पड़ता है जब कि हिंदी में sun के लिए सूर्य ,दिनकर , भानू , दिनेश और रवि इत्यादि एक सौ आठ से ज्यादा नाम है इतना ही नहीं सुबह के सूरज के लिए अरूण , दिन के सूरज के लिए दिनेश , दिनकर  जैसे नाम है । वैसे ही moon का कोई पर्यायवाची नहीं है बेचारे को परिभाषा में बांधकर ही समझाना पड़ता है । हमारी हिंदी भाषा में सैंकड़ों नाम है जैसे इन्दु , सुधांश , निशापति और सुधानिधि इत्यादि ।  कुछ और शब्द है अंग्रेजी में जैसे put , cut , shut , go और to इत्यादि अब इसका उच्चारण बड़ा विचित्र है एक फुट है और दूसरा कट हो गया या शट हो गया ये कूट , पट भी तो हो सकता था ये समझ नहीं आता ।
मनोविज्ञान के मतानुसार हम एक बालक के कम से कम वर्ष इस विदेशी भाषा के चक्कर में बर्बाद कर देते हैं । क्यों कि जो शिक्षा बालक यहां अठारह वर्ष में हासिल करता है वो शिक्षा यदि मातृभाषा में ही हो तो वो शिक्षा बालक आठ दस वर्ष में ही प्राप्त कर लेगा । अंग्रेजी में उसे समस्या आना स्वाभाविक है क्योंकि हमने कभी गहराई से उसके बारे में चिंतन नहीं किया बल्कि हम तो डंडे मार मार कर उसे अंग्रेजी भाषा सिखाते हैं और सिखा रहे हैं । बेचारा बच्चा डर से टूटी - फुटी  सिख ही लेता है । उसे समस्या इसलिए आती है क्योंकि उसकी वह संस्कार की भाषा नहीं है वह तो एक जबरदस्त थोपी गई भाषा है । 
कोई अंग्रेज बच्चा हिंदी की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर सकता है क्योंकि उसकी मातृभाषा अंग्रेजी है । 
वैश्विक स्तर पर बात की जाए डेनमार्क एक छोटा सा देश है वहां की राजभाषा डेनिश है और वह अपनी संपूर्ण व्यवस्था डेनिश में करता है । इस देश  में चाहे प्रबंधन का विषय  हो , विज्ञान हो , चिकित्सा हो या विधि हर विषय की शिक्षा डेनिश भाषा में देता है क्योंकि एक देश के विज्ञान , विधि तथा प्रबंधन  को जानना क्या किसी देश के नागरिकों का अधिकार नहीं है क्या ! 
वैसे ही फ्रांस की अपनी फ्रैंच भाषा है , वहां हर कार्य फ्रैंच में होता है । जापान अपना सारा काम जापानी में करता है। कुछेक महान लोग यह तर्क देते हैं कि अंग्रेजी के बिना हमारा निर्वाह नहीं हो सकता , हम व्यापार नहीं कर सकते तथा दूसरे देशों से संबंध स्थापित नहीं कर सकते हैं तो जापान के प्रधानमंत्री कोईजुमों जी का उदाहरण है वो अंग्रेजी नहीं जानते हैं और जहां तक व्यापार की बात है तो जापान विश्व में सर्वाधिक व्यापार करने वाला देश है , सूक्ष्म से स्थूल सामग्री का विपणन अन्य देशों में करता है लेकिन उस अंग्रेजी को जानना या न जानने का कोई फर्क नहीं पड़ता । चीन अपना सारा कार्य चीनी में करता है वैसे ही स्पेन स्पेनिश में और रूस रशियन में , जर्मनी विकसित देश है अपना कार्य बिना अंग्रेजी के करता है , नीदरलैंड में अंग्रेजी नहीं चलती ऐसे तमाम देशों के उदाहरण है ।

सच्च कहें तो जो देश अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं वहां ही अंग्रेजी उनके द्वारा लाई गई और आज अपना वर्चस्व कायम रखने में सफल हुई है । ये अन्तर्राष्ट्रीय भाषा भी नहीं हो सकती क्योंकि प्रत्येक देश की अपनी भाषा है केवल संप्रेषण करने से ही कोई भाषा अंतरराष्ट्रीय नहीं बन सकती । अंग्रेजी को तो ऐसे भी फ्रैंच का कृतज्ञ होना चाहिए क्योंकि अंग्रेजी को दस हजार से ज्यादा शब्द फ्रैंच ने दिए हैं ।  पता नहीं विश्व के भिन्न-भिन्न देशों से शब्दों को लेकर खिचड़ी बना डाली है । दूसरी तरफ हमारी हिंदी तो देववाणी का परिष्कृत रूप है अर्थात ये संस्कृत की सुपुत्री है । अंग्रेजी तो अनाथ है क्योंकि इसकी कोई जननी नहीं है । 
हम अंग्रेजी के जड़ को जानने में असमर्थ है फिर भी अपना रहे हैं । हम आज mr , miss , जैसे शब्दों का प्रयोग बड़े चाव से करते हैं वैसे ही मिसिज शब्द भी है । यूरोपीय शब्दकोश वेबस्टर में मिस्टर वो है जो बहुत सी महिलाओं के साथ रहता है वैसे ही मिस या मिसिज भी है जो अनेक पुरूषों के साथ रहती है और हम बड़े चाव से कहते हैं mr chhavinder --- she s my मिसिज 
और इन शब्दों का इतिहास मालूम नहीं होता । बेवजह मूर्ख बने होते हैं । भारतवर्ष की बात करें यही mr श्री मान हो जाता है जो कि मां लक्ष्मी का और ब्रह्मा जी का सूचक है वैसे ही श्रीमति अर्थात यूं तोड़ कर कहें तो श्री मानो तो लक्ष्मी और मति अर्थात सरस्वती ( वीणा वादिनि ) 
सर और मैडम भी ऐसे ही शब्द है । एक शब्द है mom या mummi मतलब लाश रखने की जगह या मोमबत्ती की तरह शीघ्र समाप्त होने वाली वस्तु वैसे ही बेचारे डैड - अब ये डैड मतलब - खत्म ।  
तो ऐसी भाषा के पीछे हम दौड़ रहे हैं और हमारी व्यवस्था भी हमें इसे सीखने को अभिप्रेरित कर रही है । 
विश्व के बहुत से देश हमारी भाषा पर कार्य कर रहे हैं । जर्मनी में संस्कृत विश्वविद्यालय है , नासा में संस्कृत और हिंदी की कक्षा नियमित रूप से चलती है । नेपाल के प्रसिद्ध शहरों के नाम भारत की सुसमृद्ध संस्कृति  व भाषा पर रखे गए हैं जनकपुरी इसका उदाहरण है और भारतवर्ष में अभी चर्चित शहरों के नाम उन विदेशी आक्रांताओं के नाम पर है जैसे हिमाचल प्रदेश की बात करूंगा मैक्लोडगंज , डलहौजी , शिमला का स्नोडाउन , अनाडेलऔर  नालदेहरा इत्यादि असंख्य नाम है । 
हिंदी भारतवर्ष में पच्चास करोड़ से ज्यादा लोग प्रयोग करते हैं और अंग्रेजी   का प्रयोग करने में  मात्र चार फीसदी लोग ही सक्षम है ।
हमें भाषाएं अवश्य सीखनी चाहिए लेकिन वो स्वदेशी हो जैसे पंजाबी है , तेलगु है , मराठी इत्यादि सीख लो । ये विदेशी भाषा केवल वही सीखें जो बाहर अपनी जीविकोपार्जना के लिए जाना चाहते हैं । 
हमारे देश का एक बुद्धिजीवी वर्ग है और कुछेक ऐसी ताकतें भी है जो भाषा को हथियार बनाकर देश में तनाव उत्पन्न करते रहे हैं , यहां तक कि  देश की एकता और अखंडता को भी तोड़ने का प्रयास करते हैं जो आज हमारे देश के लिए खतरा बन चुके हैं और बुद्धिजीवियों का मत है कि अंग्रेजी के बिना विकास संभव नहीं है इस तरह का भ्रम देश में फैलाते हैं । मैं समझता हुं यदि भारत सरकार और संपूर्ण राज्य सरकारें मिलकर यह प्रण ले और एक बिल पास कर दे कि पूरे भारत वर्ष का संपूर्ण कार्य हिंदी में ही होगा चाहे वो व्यापार हो या अन्य कोई भी कार्य हो तो अमेरिका , फ्रांस ,चीन , जर्मनी और रूस जैसे शक्तिशाली व समृद्ध राष्ट्रों को पहले हिंदी सीखनी पड़ेगी या व्यवस्था करनी पड़ेगी अन्यथा इन राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था मिट्टी में मिल जाएगी , अधिकतर राष्ट्र खाक हो जाएंगे , विश्व मानचित्र ही अलग दिखने लगेगा क्योंकि भारत विश्व में जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे स्थान पर है और सौ से ज्यादा देशों की अर्थव्यवस्था को संचालित करता है , सबसे बड़ा क्रय विक्रय करने वाला राष्ट्र है । 
आज इक्कीसवीं शताब्दी में हिंदी के विकास के लिए राज्य तथा केंद्र सरकारें बहुत प्रयास कर रही है । हमारे प्रधानमंत्री जी जब भी विदेश यात्रा पर जाते हैं तो हिंदी में ही अपना वक्तव्य देते हैं और आभास होता है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश के मुखिया अपनी राष्ट्रभाषा  हिंदी में भाषण या संप्रेषण कर रहे हैं । वर्तमान में नूतन शिक्षा नीति में भी बालक को  मातृभाषा में शिक्षा देने की अनिवार्यता का  उल्लेख किया गया है जो कि एक सराहनीय कदम है और इससे बच्चों को अपनी मातृभाषा तथा राष्ट्र भाषा में ज्ञान अर्जित करने का अवसर मिलेगा , हर एक चीज को समझना उनके लिए सरल हो जाएगा ।
हमारी हिंदी वास्तव में एक जानदार व शानदार भाषा है और इसे मजबूत करने की जिम्मेवारी प्रत्येक व्यक्ति की है क्योंकि ये दूसरी अन्य बोलियों व भाषाओं को जोड़ने का एक सेतु भी है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी ने ठीक ही कहा है कि हिंदी हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक व्यवहार में आने वाली भाषा है । " 
अतः हिंदी दिवस या पखवाड़े मनाने , भाषणबाजी करने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि हर रोज इसके लिए कार्य करने की आवश्यकता है , नये नये शब्दों को हिंदी में लाने पर बल देना होगा और इसमें यदि दूसरी भाषाओं से भी शब्द लेने में संकोच नहीं करना चाहिए वैसे भी हम बहुत से दूसरी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग हिंदी में करते हैं खासकर अंग्रेजी के तभी तो हम इसे हिंग्लिश भी कहते हैं । अंत में ये ही कहना चाहूंगा 

अंग्रेजी से नाता बनाए रखें 
लेकिन हिंदी से संबंध तोड़कर नहीं 
हिंदी है हमारी पहचान 
आओ इसका करें सम्मान 
तभी बढ़ेगा हिंद देश का मान 

भाषा , संस्कृति , सभ्यता और व्यवस्था ही किसी देश की वास्तविक पहचान है 
भारत की भाषा महान है क्योंकि देव वाणी है 
संस्कृति व सभ्यता महान है क्योंकि भगवान इस पावन भूमि में जन्म ले चुके हैं , महान , प्रतापी ऋषि मुनियों ने तप किया है निश्चय ही महान है 
व्यवस्था -- ये वह भूमि है जहां पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जी , भगवान श्रीकृष्ण जी प्रधानमंत्री रह चुके हैं इसलिए ये भारत वर्ष जो सदैव तेज प्राप्ति में लगा है , संघर्ष शील है निश्चय ही महान है । 



छविंदर शर्मा हिमाचली
शोधार्थी

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