केंद्र सरकार में मंत्री बनने वाले भानुप्रताप वर्मा जालौन के दूसरे सांसद बने



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गया प्रसाद के असमय निधन के बाद उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ने का मौका 1996 में मिला
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मोदी मंत्रिमंडल में शामिल हुए भानु प्रताप को अब अपनी कार्य पद्धति में परिवर्तन लाना होगा
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डॉ. राकेश द्विवेदी, उरई
जालौन लोकसभा का आज क्रम बढ़ गया। पहले कांग्रेस से चौधरी रामसेवक और अब भाजपा के भानुप्रताप वर्मा। रामसेवक के जमाने में मोबाइल फोन नहीं थे पर बेसिक फोन वह खुद ही उठाया करते थे। भानु प्रताप पर आरोप है कि वह मोबाइल काल रिसीव करने में बहुत कम रुचि रखते हैं। कई बार अत्यंत महत्वपूर्ण काल पर भी मोबाइल नहीं उठाते। वे सरल और अन्य लोगों से ज्यादा ईमानदार भले ही माने जाते हों पर उनकी ढुलमुल और अति नीरस कार्य पद्धति को लेकर कार्यकर्ताओं तक में असंतोष रहता है। 
मूल रूप से कोंच के निवासी भानुप्रताप वर्मा जवानी के दिनों में लंबी दूरी के धावक हुआ करते थे। इसके बाद वह शौकिया राजनीति में आये। पहले सभासद बने इसके बाद कोंच से ही 1989 में विधायक बने। सांसद गयाप्रसाद कोरी के असमय निधन के बाद बाबूराम एमकॉम की पसंद पर उनको लोकसभा का प्रत्याशी बनवाया गया। 1996 में वह पहली बार सांसद बने। 1999 में बसपा से बृजलाल खाबरी और 2009 में सपा से लड़े घनश्याम अनुरागी से चुनाव हारे थे। इसके अतिरिक्त वह चुनाव लड़ते गए और सांसद बनते रहे। 2019 में वह पांचवी बार सांसद बने। अब मंत्री बने भानुप्रताप जिले के ऐसे दूसरे सांसद हो चुके हैं जो केंद्र में मंत्री  बने हैं। इसके पहले यह सम्मान चौधरी रामसेवक को मिला था। तब वे कई मंत्रालय संभालते रहे थे। आखिरी बार स्वास्थ राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) थे। भानुप्रताप का सम्बंध बाबूराम एमकॉम गुट से रहा है। उनके मंत्री बनने से अभी तक जिले में जो इस गुट का जो वर्चस्व का संकट रहा है, उसमें अब संतुलन बन सकता है। इस गुट को जिले की राजनीति में पनपने नहीं दिया जा रहा है। इनके नेताओं को मुख्यधारा से अलग रखने का प्रयास ऊपर से होने के भी आरोप हैं। 
भानुप्रताप को मनमौजी भी माना जाता है। बताया जाता है कि कई बार उनकी लेट लतीफी से दादा भी नाराज हो जाया करते थे। अपनी कार्यपद्धति में कोई बदलाव न आ पाने से कार्यकर्ता भी नाखुश रहते हैं। फोन न उठाने  की उनकी प्रमुख समस्या मानी जाती है। अब वह हार्ड वर्कर मोदी की टीम में हैं। ऐसे में उन्हें उन आदतों को छोड़ना पड़ेगा जो उनके नंबर को कम करते हैं। वैसे उ हैं ऐसा नेता माना जाता है जो साफसुथरी राजनीति करते हैं। किसी का बुरा न सोचने के कारण ही बिना किसी ठोस काम के वह जीतते रहे हैं।फिलहाल बाबूराम गुट के नेता अब गदगद हैं।

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