जांगिड़ के बहाने ईमानदारी पर बहस

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भारतीय  प्रशासनिक सेवा के 2014  बैच के अधिकारी लोकेश कुमार जांगिड़ के बहाने आज एक बार फिर हम ' ईमानदारी ' पर चर्चा करने का अवसर पा चुके हैं .मध्यप्रदेश कैडर के इस नौजवान अधिकारी को ४  साल में ८ तबादलों का समना करना पद रहा है. हाल ही में राज्य शासन ने उसका तबादलना सिर्फ इसलिए कर दिया है की वो एक प्रमोटी अधिकारी कलेक्टर की राह का रोड़ा बना हुआ था .
देश में अखिल भारतीय सेवाओं में लोकेश पहले अधिकारी नहीं हैं जिनहन ईमानदारी की बीमारी है और सरकारें इस बीमारी से ग्रस्त अधिकारियों के इलाज के लिए केवल और केवल तबादले का डोज देती है. मध्यप्रदेश में एक लोकेश हैं तो दुसरे प्रदेशों में अनेक लोकेश हैं. हरियाणा के खेमका को तो आप पहचानते ही होंगे .लोकेश युवा हैं ,उसके तमाम सपने होंगे जो वो एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में पूरा करना चाहता हो और न कर पाने के कारण हताश हो ,लेकिन लोकेश ने कहा है की  -'ईमानदारी ' एक महंगा शौक है ,और हर किसी के बस की बात नहीं है '.हमें लोकेश कुमार जांगिड़ की इस बात पर बहस करना चाहिए .
पिछले 45 साल में एक पत्रकार  के नाते  मेरा  साबका  एक से बढ़कर  ईमानदार  और एक से बढ़कर एक भ्र्ष्ट अधिकारियों से पड़ा है .इस बिना पर मै कह सकता हूँ की भाप्रसे में हर नौजवान ईमानदारी की एप्रिन पहनकर ही प्रवेश करता है. हर नए अधिकारी की कोशिश होती है की वो अपने अधिकार क्षेत्र में रहकर समाज को,सिस्टम को बदल दे,लेकिन हर कोई ऐसा कर नहीं पाता .वजह ये है की उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा सबसे पहले तो उसके वरिष्ठ अधिकारी बनते हैं और बाद में निर्वाचित जन प्रतिनिधि .जहाँ ये दोनों एक हो जाते हैं वहां तो ईमानदार अधिकारी का टिक पाना कठिन हो जाता है. 
लोकसेवा नियमों में बंधे ईमानदार अधिकारियों के लिए दो ही रास्ते होते हैं की या तो वे बहती हुयी भ्र्ष्टाचार की गंगा में हाथ धोना सीख लें या फिर एक किनारे खड़े हो जाएँ .वे गंगा के शुद्धीकरण अभियान के बारे में सोच भी नहीं सकते ,और अगर ऐसी कोई हिमाकत करते भी हैं तो उन्हें भी जानगड़ गति प्रदान कर दी जाती है .उन्हें हर समय अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर रखना पड़ता है .
मेरा अनुभव है की सिस्टम को बदलने की जिद पालने वाले बहुत कम अधिकारी ऐसे होते हैं की जिन्हें अपने अभियान में कामयाबी मिल पाती है .अपवाद ही होते हैं ऐसे अफसर ,अन्यथा सबको हथियार डालना पड़ते हैं .हथियार डालने वाला अफसर फिर कितना खतरनाक हो जाता है ये समझने की बात है .जांगिड़ के साथ भी यही हो रहा है .दरअसल जांगिड़ ने ज़रा जल्दी कर दी.उसे जो करना था उसके लिए उसका कम से कम कलेक्टर होना जरूरी था.बहुत से जांगिड़ ब्रांड अफसर कलेक्टर बनने के बाद भी अपने सपने पूरे नहीं कर पाते,क्योंकि उन्हें न अपने मातहतों का समर्थन मिलता है और न ही वरिष्ठ अधिकारियों का ,राजनेताओं के समर्थन का तो सवाल ही नहीं .
भाजपा के सत्ता में आने के बाद एक नया ट्रेंड ये चला की सरकार ने ज्यादातर काम प्रमोटी प्रशासनिक अफसरों को सौंप दिए,क्योंकि प्रमोटी अफसर अव्वल तो हर पद की नीलामी में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और राजाज्ञाओं का पालन भी सर झुककर ,घुटनों के बल बैठकर करते हैं .सीधी भर्ती वाले अफसरों से करा पाना कठिन तो नहीं हाँ आसान भी नहीं होता .सरकार के इस रवैये की वजह से अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में धड़ेबाजी बढ़ गयी है .दोनों एक-दूसरे को अछूत समझते हैं .मैंने वरिष्ठ पदों पर बैठे अधिकारियों को सीधी भर्ती वाले कलेक्टरों से बात करने में हिचकते देखा है .
लोकेश के केस में एक बात महत्वपूर्ण ये है की अभी तक आईएएस यूनियन खामोश है.किसी ने न उसका समर्थन किया है और न विरोध.उलटे भाजपा के ही सांसद सुमेर सिंघ जांगिड़ के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं .अतीत के अनुभव बताते हैं की जहां भी इस तरह के टकराव हुए हैं वहां राज्य शासन ने समझौता नहीं किया है ,क्योंकि ऐसा करना सरकार के इकबाल के खिलाफ जाता है .सरकार को ईमानदारी उसी हद तक पसंद या स्वीकार्य है जहां तक की उसके हित प्रभावित न हों .जांगिड़ को उनके कलेक्टर सिर्फ इसलिए हटवा पाए क्योंकि वे मुख्यमंत्री के सजातीय है और दूसरे प्रमोटी हैं .प्रमोटी अफसर सत्ता के साथ जितना सुविधाजनक तरिके से काम कर पाता है सीधी भर्ती के लोग नहीं कर पाते .
मध्यप्रदेश में आप जिसे सबसे ज्यादा ईमानदार आईएएस अफसर मानते हों उसका नाम निकाल लीजिये ,एक सीमा के बाद उसे भी मुख्यधारा में बहना पड़ता है. जो नहीं बह पाते वे या तो हमेशा किनारे पड़े रहते हैं या फिर कुढ़ते रहते हैं  मप्र कैडर में वर्तमान में 417 पद हैं। इनमें से 302 पद भरे हुए हैं। एक सैकड़ा  पद अब भी खाली हैं। हालांकि इनमें वे  आईएएस अधिकारी शामिल हैं जो हाल ही राज्य प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदोन्नत किए गए हैं। यदि इन्हें भी शामिल कर लिया तो कैडर में अब भी 98 अफसरों की कमी है। शेष बचे अफसरों में से करीब 40 अफसर केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ हैं। इस तरह प्रदेश में केवल 259 आईएएस अफसर काम कर रहे हैं। जो अफसर प्रदेश में काम कर रहे हैं उनमें से 56 अफसर सबसे जूनियर हैं। 
एक तरफ सरकारों को जांगिड़ ब्रांड अधिकारी पचते नहीं है दूसरी तरफ पूरे देश में आईएएस अफसरों का भारी टोटा है .रकार के प्रशासनिक ढांचे की रीढ़ समझे जाने वाले आईएएस अधिकारियों की भारत में भारी कमी हो गई। केंद्र सरकार ने स्वयं इस बात को स्वीकार किया है। पूरे देश में आईएएस अफसरों के कुल 6154 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में सिर्फ 4377 आईएएस अधिकारी हैं।पूरे देश में आईएएस अफसरों के 1777 पद खाली पड़े हैं, जो कुल पदों के करीब 30 प्रतिशत के बराबर है। 4377 आईएएस अफसरों में भी ऐसे अफसरों की संख्या शामिल है जो आने वाले वर्षों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं।
राज्यों के आंकड़ों को देखा जाए तो सबसे ज्यादा खाली पदों की संख्या उत्तरप्रदेश में है। यहां पर प्रशासनिक सेवाओं के 216 पद खाली हैं। सबसे ज्यादा आईएएस अफसर देने वाले राज्य बिहार में 128 पद खाली हैं। वह दूसरे नंबर पर है। मध्यप्रदेश में 118, राजस्थान में 112 और झारखंड में आईएएस अफसरों के 100 पद खाली हैं।ऐसी स्थिति में सवाल फिर खड़ा होता है की क्या ईमानदार अधिकारी सिस्टम में अपना वजूद बनाये रख सकेंगे ?या उन्हें भी भ्र्ष्टाचार की गंगा में डुबकियां लगाने की आदत डालना पड़ेगी .ये समस्या सिर्फ आईएएस अफसरों की नहीं आईपीएस अफसरों की भी हैं. पुलिस में भी अनेक जांगिड़ अपनी ईमानदारी की वजह से खदेड़े जा रहे हैं .
@ राकेश अचल

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