आलेख : धर्म संकट में या धरम संकट में ❓




*हिंद के पहरेदार ने जिस फक्र से वतन की हिफाजत का जिम्मा लिया था उसी ने हिंद की आवाम को धर्म के साथ महामारी से लेकर शमशान की आग में झोंक दिया है ।*



_विवेक तिवारी_
आज के वर्तमान हालात में हिंद की आवाम के लिए यह फैसला करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है कि धर्म संकट में है या वतन की आवाम धरम संकट में है ,,,? वतन ए हिंद के जिम्मेदार पहरेदार ने जिस फक्र से वतन के आवाम की हिफाजत का जिम्मा लिया था आज उसी वजीर ए आजम ने हिंद की आवाम को धर्म जाति संप्रदाय के साथ साथ महामारी से लेकर शमशान की आग में झोंक दिया है । आलम यह है कि पतित पावनी मां गंगा जो चिरकाल से आम जनता की एवं सभी धर्मों की धरोहर रही है आज उसी पतित पावनी मां गंगा के गर्भ में लाशों के अंबार लगे हुए हैं । अपने गर्भ से लाशों को जन्म देने वाली पतित पावनी मां गंगा के अस्तित्व को मिटाने के लिए जिम्मेदार कौन है ? हिन्द के देशवासी जिस जाति धर्म संप्रदाय आदि के अस्तित्व विहीन सम्मान के लिए हिंदू मुस्लिम कर रहे हैं यह कौन करवा रहा है और यह जंग हमें किस मोड़ तक ले जाएगी ? हिंदू मुस्लिम के नाम पर देश, जमीन, इंसान का बंटवारा करने वाले सफेदपोश कौन हैं ? कैसे होते हैं यह लोग ? *कहां से आते हैं लोग ?*
ये हमे बांटने वाले, जाति धर्म संप्रदाय, मंदिर मस्जिद के नाम पर बांटने वाले आसमान से नही टपकते और ना ही धरती मां की कोख से फसल बनकर पैदा होते हैं । ये वो विषाणु, कीटाणु, दीमक हैं जो हमारे बीच से पैदा होकर अजगर बन जाते हैं और सफेद चोला ओढ़कर हमे ही निगल जाते हैं । “धर्म संकट में है या धर्म संकट में„ इस सवाल का जवाब आज हिंद के शीर्ष सिंहासन पर विराजमान चांडाल चौकड़ी के पास भी नहीं होगा, क्योंकि इनको पता है हिंदुस्तान की आवाम को धर्म के नाम पर लड़ाना, बांटना बहुत आसान है । इसके लिए इन सफेद पुरुषों को ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ती किसी भी छोटे बड़े मंच से किसी एक धर्म के लोगों की बुराई कर सांप्रदायिकता फैलाना बहुत मुश्किल नहीं लेकिन उस सांप्रदायिक दंगे को रोकना आसान नहीं होता । धर्म के नाम पर होने वाला दंगा किसी भी संप्रदाय का हो हर हाल में नुकसान आम जनता को ही भुगतना पड़ता है फिर चाहे वह कोर्ट कचहरी के रूप में हो या महंगाई के रूप में हो या अन्य किसी रूप में । दंगे की भरपाई आम इंसान ही करता है । उसी दंगे की आग पर चंद चिंदी चोर सफेदपोश अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते हैं जो आम जनता को दिखाई नहीं देती । जाहिर है इतनी सी बात आवाम को समझ लेनी चाहिए कि आज किसी भी जाति किसी भी संप्रदाय का धर्म संकट में नहीं है बल्कि आज हिंद की आवाम धर्म संकट में है जो शमशान में अपने परिजनों की चिताओं को जलाने के लिए टोकन लेकर कतार में खड़ी है तो कहीं कब्रिस्तान में जनाजे को दफनाने के लिए जगह नहीं मिल रही है तो कहीं हॉस्पिटल में चंद सांसों के लिए ऑक्सीन खरीदने हेतु लोग अपने जेवर तक बेचने को मजबूर हैं इन हालात का असल जिम्मेदार कौन है ❓ हिंद की आवाज सब कुछ जानते हुए मूकदर्शक बन तमाशबीन बनी हुई है और उसी आवाम की मजबूरी का तमाशा हमारे देश के कर्णधार सिनेमैस्कोप पर्दे पर अपने आलीशान वातानुकूलित कमरों में बैठकर देख रहे हैं । चंद्र राजनीतिक सफेदपोश नेताओं ने हिंद की आवाज की आंखों पर धर्म का चश्मा ऐसा चढ़ा दिया है जिसमें केवल इंसान को छोड़कर बाकी सब कुछ दिखाई देता है और कानों में केवल अपने नाजायज बाप के शब्द सुनाई देते हैं । लोगों को यह बात समझ लेनी चाहिए की जहां “दीपावली में अली का नाम आता है तो वही रमजान में राम का" लेकिन कुछ धर्म के ठेकेदार और राजनैतिक दलालों ने मंदिर मस्जिद एवं हिंदू मुस्लिम के नाम पर हमेशा से देश के टुकड़े किए हैं और अगर आलम यही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बचे हुए वतन के दो टुकड़े और हो जाएंगे । इसलिए बात समझ में आए तो ठीक और नहीं आए तो आपकी मर्जी लेकिन यह एक बहुत कड़वा सच है कि आज धर्म संकट मे होने से ज्यादा हिंद की आवाम धरम संकट में है जिसे हम सबको मिलकर बचाना है इस महामारी से मिलकर लड़ना है । बचा सकते हो तो बचा लो या अपने आकाओं की बात मानकर धर्म के लिए लड़ते रहो ❓

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