आपदा में अवसर तलाशते हमलोग

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प्रधानमंत्री जी ने आपदा में अवसर तलाशने की सलाह क्या दी मध्यप्रदेश में मंत्री और उनके इर्दगिर्द रहने वाले लोग टूट पड़े अवसर तलाशने,सूबे में आपदा की तो पहले से ही कोई कमी नहीं थी .आपदा के समय प्राणरक्षक इंजेक्शन और ऑक्सीजन के साथ ही एम्बुलेंस तक का इस्तेमाल इस अवसर के लिए  किया गया ,लेकिन मुख्यमंत्री अपने सरकारी बंगले में केले और मौलश्री के पौधे ही रोपते रह गए .उन्होंने आपदा में अवसर तलाशने को न बुरा माना और न संज्ञान लिया .
राज्य सभा  सदस्य और पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के शिष्य प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट का बेटा इंदौर में इंजेक्शनों की कालाबाज़ातरी करने के आरोप से घिरा  लेकिन मंत्री जी ने पूरी दृढ़ता  से आरोपों का खंडन कर दिया .आपदा में अवसर तलाशने वालों में दृढ़ता का होना पहली शर्त है .मंत्री जी ने आरोप लगाने वालों पर मानहानि का मामला चलाने की धमकी दी लेकिन मामला चलाया नहीं ,क्योंकि मंत्री जा का मानमर्दन इतने छोटे आरोपों से होता ही कहाँ है ?
मालवा अंचल में ही एक युवा मंत्री मोहन यादव के प्रतिनिधि पर अस्पताल के ही डाक्टरों ने कोरोना मरीजों के लिए आरक्षित बिस्तर हथियाने और फिर उन्हें  ले-देकर आवंटित करने का आरोप लगाया लेकिन यहां भी मंत्री खाली बादलों की तरह गरजे किन्तु बरसे नहीं.बरसने के लिए आँखों में पानी तो चाहिए जो अब बचा नहीं है. राजधानी भोपाल से लेकर जिलों तक में विधायक और नेता यही काम कर रहे हैं किन्तु मामा मुख्यमंत्री मौन हैं.उनका 'किल कोरोना' अभियान इसी फेर में मरा जा रहा है .कहीं कोरोना के मरीजों के साथ इलाज के बजाय बलात्कार की कोशिशें हो रहीं हैं तो कहीं उन्हें इलाज के नाम पर लूटा जा रहा है .
ग्वालियर में कांग्रेस के एक विधायक की सास को कोई कंसेशन न देने वाले एक लुटेरे अस्पताल पर विधायक जी का गुस्सा ऐसा फूटा कि संचालक हाथ जोड़ने लगा ,लेकिन किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी .यहीं एक मंत्री जी ने तो खुद अस्पताल के बाहर सोने का कष्ट किया ताकि कोई कोरोना मरीज अस्पताल के दरवाजे से बेरंग न लौटे .मंत्री जी को देखकर मरीज ही नहीं आये ,बेचारे किसकी मदद करते .मुरार में जनसम्पर्क विभाग के एक फोटोग्राफर को बिना वेंटिलेटर मरना था सो बेचारा मर गया .आपदा में अवसर तलाशने वालों का क्या बिगड़ा .
पूरे प्रदेश में इस समय आपदा नेताओं,विधायकों और मंत्रियों के कौशल प्रदर्शन का अवसर बना हुआ है. कोई आक्सीजन टेंकर के आगे-पीछे दौड़ रहा है तो कोई सड़कों का सेनेटाइजेशन कर रहा है. डाक्टरों  को उनका काम करने देने में अड़चन डालना इन नेताओं का पहला और आखरी शगल है .एक पुराने मंत्री ने भी अपने पेंशन खाते से दो लाख रूपये देकर दरियादिली दिखाई लेकिन खबर छपवाने के लिए अखबार वालों की नाक में दम कर दी .
मध्यप्रदेश में ही नहीं बल्कि देश के हर हिस्से में आपदा के समय राजनीति समानांतर रूप से अपना काम कर रही है. पटना में एक केंद्रीय मंत्री दर्जनों एम्बुलेंस दबाकर बैठे रहे क्योंकि उनके पास ड्राइवर नहीं हैं.एक दुसरे नेता जी ने मंत्री जी की पोल खोली तो मंत्री जी बमके और बोले की नेताजी ड्राइवर लाएं और एम्बुलेंस ले जाये,जैसे मंत्री जी ने एम्बुलेंस अपनी गाढ़ी कमाई से खरीदी हों ? सारा माल सांसद निधि से कमीशन के आधार पर किया गया .इस मामले में की बराबरी दिल्ली में एक आप नेता के घर से मिले सैकड़ों आक्सीजन  सिलेंडरों से नहीं की जा सकती .आप की सफाई है कि मंत्री जी तो मरीजों की सुविधा के लिए प्रबंधन कार्य देख रहे थे .
मेरी समझ में नहीं आता की आपदा में अवसर तलाशने में नक्कालों और मिलावटखोरों तथा जमाखोरों की तरह हमारे नेता भी अमानुषिक काम में जुट जाते हैं. यदि नेताओं का दिल सचमुच दरिया है तो वे अपनी तमाम निधियां सांसद और विधायक निधियों के अलावा अपने-आपने जिले के कलेक्टरों को क्यों नहीं दे देते. अभी तक मरीजों को इंजेक्शन,ऑक्सीजन और पलंग दिलाने का दावा करने वाले मंत्रियों,सांसदों और विधायकों ने अपनी जेब से फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं की है. वे सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सांसदविधायक निधि को ही अपनी बपौती समझकर पुण्य कमा रहे हैं .
बात तो तब बनती जब माननीय प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री कोरोनाकाल में अस्पतालों,दवाओं ,ऑक्सीजन आदि को दिलाने में राजनीतिक हस्तक्षेप करने वालों के खिलाफ आपराधिक और दंडात्मक कार्रवाई करते .उन्हें जेल भेजते लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया क्योंकि नेता तो सिस्टम को अपना रखैल समझते हैं .आपदा में अवसर तलाशने वालों के खिलाफ समाज भी कुछ करने की स्थिति में नहीं है. इन लोगों का समाजिक बहिष्कार  भी तो नहीं किया जा सकता ,क्योंकि समाज में भी इनके ठेकेदार और एजेंट पहले से मौजूद हैं .
ये सही अवसर है जब केंद्र और राज्य सरकारें अपनी तमाम गलतियों को सुधरने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से एकदम मुक्त करा ले,किन्तु यदि ऐसा किया जाये तो राज्यों सरकारों के साथ ही पक्षपात होना शुरू हो जाता है,व्यक्ति तो दूर की बात है. दिल्ली और महाराष्ट्र और कर्नाटक को अपने हिस्से के इंजेक्शन,ऑक्सीजन और टीके हासिल करने के लिए अदालतों की शरण लेना पड़ती है.ऐसे में कोई जाये तो जाये कहाँ.?भ्र्ष्टाचार की भांग तो हर कुएं ,तालाब और नदी में घुली पड़ी है .कोई जगह निर्मल है ही नहीं .
इस आपदा के बाद मतदाताओं को अगले चुनाव के समय वोट मांगने आने वालों से सबसे पहले आपदा में हुई मौतों का हिसाब मांगना चाहिए. सबको निशुल्क स्वास्थ्य का हक मांगना चाहिए. बाजार से खरीदी जाने वाली हर चीज पर टेक्स देकर सरकारों के खजाने भरने वाली जनता यदि इस आपदा के बाद भी नहीं जाएगी तो फिर उसे दूसरा कोई मौक़ा शायद ही मिले. कोरोना पता नहीं तब तक कितनों को श्मशानों और कब्रगाहों के हवाले कर चुका होगा ..
मै जानता हूँ कि मै जो कह रहा हूँ ऐसा बहुसंख्यक लोग कहना चाहते हैं किन्तु कह नहीं पा रहे,कुछ को कहने का सलीका नहीं आता तो किसी के पास कहने का साहस नहीं है और जो शेष हैं वे भक्तिभाव की वजह से कुछ कहना नहीं चाहते. अपनी ही जांघ उघाड़कर कौन दिखाए.?मित्रो ये समय एक भयानक और क्रूर समय है इसमें मौन साधना सबसे बड़ा अपराध है .इसलिए जहाँ जगह,अवसर मिले बोलिये ,हस्तक्षेप कीजिये .अन्यथा आपके हिस्से में पछतावे के अलावा कुछ बचेगा ही नहीं .
@ राकेश अचल

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