कहने को तो सत्ता की कुर्सी भोपाल में होती है लेकिन उस कुर्सी तक पहुंचने का जो रास्ता है उसकी चाबी सूबे के सियासी सूरमा ग्वालियर चम्बल की धरती पर तलाश रहे हैं आखिर तलाशे भी न तो क्यों ? यह बात वह अच्छे से जानते हैं कि कमलनाथ को सत्ताच्युत करने में और शिवराज को सत्तासीन करने चम्बल के बागी विधायकों की अहम भूमिका रही थी उसके पूर्व कांग्रेस को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने वाली यह चम्बल की घाटियों के लाल ही थे जिन्होंने शिवराज को माई का लाल का चैलेंज याद दिलाकर सड़क पर ला दिया था ग्वालियर चम्बल के 8 जिलों में 34 विधानसभा सीटें है जो किसी भी दल को सत्ता में पहुँचाने में अहम भूमिका निभाती है
5 फरवरी दिन रविवार को प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह भिण्ड में विकास यात्रा को झंडी दिखाकर अपनी उपलब्धियों को गिनवाने का काम कर रहे थे तो वही पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ दिग्गी राजा के ग्वालियर में संत रविदास जयंती के बहाने सियासी जमीन तैयार कर रहें हैं कांग्रेस का कार्यक्रम ग्वालियर के थाटीपुर इलाके में था यह वही इलाका है जहाँ 2 अप्रैल के सवर्ण दलित संघर्ष की शुरुआत हुई थी जो बाद में पूरे अंचल में फैल गई थी
चंबल अंचल में दलित वोट बहुतायत है व निर्णायक भूमिका में भी है इसी को ध्यान में रखकर दोनों दलों के सूरमा संत रविदास जयंती को माध्यम बनाकर वोट साधने की जुगत में लगे हैं एक तरफ दलित वोट लुभाने के प्रयास है दूसरी तरफ सवर्ण वोट न खिसक जाए इसका भी ख्याल रखते हुए कमलनाथ दिग्गी राजा के सहारे क्षत्रिय वोट पर मजूबत पकड़ रखना चाहते है तो वहीं शिवराज ने भी अपने कुनबे के क्षत्रिय नेताओं भदौरिया द्वय पर विश्वास जमा रखा है अभी करणीसेना के आंदोलन को खत्म करवाने में रणनीतिक भूमिका निभाने वाले अरविंद भदौरिया चम्बल में शिवराज के बेहद करीबी है कुलमिलाकर बात यह सामने आती है कि दोनों दलों को यह लगता है कि श्यामला हिल्स की चाबी चम्बल के पानी मे ही मिलेगी अपने राम तो कहते है कि आप जम कर चम्बल की सैर करो सभा करो ताकि हकीकत तो देख सको बाकी शुभकामनाओ के साथ जै राम जी की


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