मनीष विद्यापीठ स्कूल ने याद किया भारत की प्रथम महिला शिक्षिका एवम समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले जी को




लहार --पंडित स्वर्गीय श्री दयाराम महते शिक्षा प्रसार एवं समाज कल्याण समिति लहार द्धारा संचालित मनीष विद्यापीठ स्कूल पुरानी गल्ला मंडी लहार में आज भारत की प्रथम महिला शिक्षिका और समाजसेविका रही सावित्रीबाई फुले जी को उनके जन्मदिवस के अवसर पर याद किया।
उनके चित्र पर माल्यार्पण कर विद्यालय में अध्यापन का कार्य कर रहे शिक्षक एवम शिक्षकाओ ने भी उनके चित्र पर पुष्प अर्पित किए इसी क्रम में विद्यालय में अध्ययन कर रहे छात्रों ने भी पुष्प अर्पित किए।
पुष्प अर्पण के पश्चात विद्यालय में एक गोष्टी का आयोजन किया गया जिसमे सावित्रीबाई फुले जी के जीवन के बारे में सभी छात्र छात्राओं को शिक्षको के द्रारा महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गई जिससे छात्र छात्राओं को भारत के महापुरुषों/महान नेत्रियों के बारे में ज्ञान प्राप्त हो सके। 
इस क्रम में विद्यालय प्रबंधन समिति के सचिव एडवोकट सुमित महते के द्धारा बताया गया की सावित्रीबाई जी फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित नायगांव नामक छोटे से गांव में हुआ था। वे भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारिका एवं मराठी कवियत्री थीं। उन्होंने अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर स्त्री अधिकारों एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। उन्हें आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है। 1852 में उन्होंने बालिकाओं के लिए एक प्रथम विद्यालय की स्थापना की। और उनकी मृत्यु 10 मार्च 1897 को हुई थी।
इसी क्रम में विद्यालय की शिक्षिका निशा अग्रवाल ने बताया कि 
वे स्कूल जाती थीं, तो विरोधी लोग उनपर पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे। आज से 191 साल पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था तब ऐसा होता था आज उन्ही की देन हैं की हमारे भारत वर्ष में महिलाओं और पुरुषों को समान रूप से शिक्षा देने का कार्य किया जा रहा है।
अगले क्रम में विद्यालय की संचालिका अनीता बडेलाल महते ने बताया कि सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं। हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया। 5 सितंबर 1848 में पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ उन्होंने महिलाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। तत्कालीन सरकार ने इन्हे सम्मानित भी किया। एक महिला प्रिंसिपल के लिये सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी। सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया।
इस अवसर पर विद्यालय के समस्त स्टाफ एवम छात्र छात्राये उपस्थित रहे।

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