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राज कुमार शाही
सदस्य, प्रगतिशील लेखक संघ, पटना।
सदस्य, केदार दास श्रम एवं शोध संस्थान, पटना।
दोस्तों, महंगाई जोरों पर है घरेलू उपयोग की वस्तुएं लगातार महंगी होती जा रही है। पिछले पांच राज्यों के चुनाव में भी महंगाई से त्रस्त आवाम के लिए महंगाई कोई मुद्दा नहीं बन सका।नकारा विपक्षियों के बीच कोई खास मुद्दों पर आधारित एकता नहीं बन सका जिसका फायदा भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों को मिला। डीजल एवं पेट्रोल,रसोई गैस सिलेंडर एवं अन्य बुनियादी सुविधाएं लगातार महंगी होती जा रही है। मध्यमवर्ग का एक बड़ा हिस्सा काफी तेजी से निम्न वर्ग की श्रेणी में शामिल हो रहा है। अभूतपूर्व रूप से अमीरी और ग़रीबी के बीच खाई लगातार बढ़ता जा रहा है।लोग पांच किलो अनाज के लिए घंटों और कभी कभी कई दिनों तक लंबी कतार में खड़े होकर समय गुजार रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं लगातार सीमित होती जा रही है साथ ही साथ निजीकरण की नीतियों ने निजी क्षेत्र के पूंजीपतियों के रहमो करम पर छोड़ दिया है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को कोई सामाजिक आर्थिक सुरक्षा का प्रावधान नहीं किया जा सका है। सरकार अपने प्रतिष्ठित सार्वजनिक संस्थाओं से अपने हाथ धीरे धीरे खिंचते चली जा रही है मजदूर वर्ग के व्यापक हिस्सा में आक्रोश मौजूद है। रेलवे, बैंक, बीमा, दूरसंचार विभाग,डाक विभाग, शिक्षा और स्वास्थ्य एवं अनुसंधान संस्थान धीरे धीरे अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। फिल्मों एवं धारावाहिकों के माध्यम से प्रभुत्वशाली वर्ग अपने विचारों को काफी सजगता के साथ थोपने में लगी हुई है। समाज में व्यापक पैमाने पर असंतोष होने के बावजूद प्रतिगामी शक्तियां बहुसंख्यकवाद के सहारे,जाति और धर्म आधारित राजनीति में आम आवाम को उलझा कर अपने राजनीतिक एजेंडे को लागू करने में लगी हुई है। दुसरी तरफ प्रगतिशील ताकतें आपसी मतभेदों एवं वैचारिक दिवालियापन का शिकार हो कर रह गई है। पूंजीवाद गैरबराबरी एवं विषमता को बढ़ावा देने में बढ़-चढ़कर काम कर रही है। क्या साम्प्रदायिक शक्तियों को जातिगत तोड़ जोड़ की राजनीति के सहारे परास्त किया जा सकता है? जाति आधारित आरक्षण के सहारे वोट बैंक को साधने में जुटी राजनीतिक दलों ने कभी निजीकरण की नीतियों के खिलाफ व्यापक पैमाने पर आंदोलन क्यों नहीं किया? आज शोषण का आधार क्या है? किस समुह के बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हो रहे हैं? मजदूर वर्ग और उसकी राजनीति करने वाली शक्तियां जाति और वर्ग के सवाल पर सुसंगत नीति बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकी? मजदूर वर्ग के विभिन्न हिस्सों में जाति और धर्म आधारित राजनीति ने ,न केवल गहरी पैठ बना ली है बल्कि वह आज एक कोढ़ बनकर पूरे राजनीति को पोषित करने का काम कर रही है। बेरोजगारी अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है परन्तु चुनाव में यह एक मुद्दा नहीं बन सका नफरत फ़ैलाने वाली शक्तियों ने धर्म का ऐसा जलवा बिखेरा है कि हम अपने मूल भूत आवश्यकताओं को भी तिलांजलि देकर तथाकथित धर्म की रक्षा के खातिर हम सब कुछ सहन करने के लिए तैयार हैं। आखिर शेर पालना आसान थोड़े ही है इसके लिए किसानों और मजदूरों को अपने हितों को कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना पड़ेगा।इस देश में मंदिर और मूर्तियां ज्यादा जरूरी है एक आधुनिक ज्ञान विज्ञान के केंद्र से ताकि लोगों को आसानी से धर्म और जाति के नाम पर गुमराह कर आसानी से वोट लिया जा सके। भवानी प्रसाद मिश्र ने कहा है कि "झूठ आज से नहीं
अनन्त काल से
रथ पर सवार है
और सच
चल रहा है
पांव पांव"।

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