क्या भारत वास्तव में गरीब है?@ भावना नायक



इसे जानना अत्यंत आवश्यक है। हमारी सरकार चांद पर पहुंचने की बात करती है, लेकिन क्या उसे देश की सब से बड़ी गरीबी की समस्या नहीं दिखती? यदि सरकार दृढ़निश्चयी हो जाए और लोग अनैतिकता की मानसिकता से उबरें तो गरीबी काफी हद तक दूर हो सकती है। अब ऐसे हालातों में यदि मैं व्यंगात्मक टिप्पणी कर देता हूं तो, सार्वजनिक मंच के बहुत सारे लोगों को बुरा लग जाता है। लेकिन लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि, मैं कड़वा सच को प्रस्तुत करना बंद कर दूंगी

हमारा देश प्राचीन काल से गरीब है। गुलामी बाद में आई, गरीबी तो सनातन है। भारत एक ही सनातन धर्म को जानता है, वह है गरीबी। हम लोग जो कहानियां सुनते आ रहे हैं कि भारत सोने की चिडि़या थी, उन कहानियों में विश्वास मत कीजिए क्योंकि जिन के लिए भारत एक सोने की चिडि़या थी, उन के लिए आज भी सोने की चिडि़या ही है। वे थोड़े से लोग हैं लेकिन अधिकतर लोगों के लिए कहां सोना, कैसी सोने की चिडि़या? ज्यादातर लोग गरीब और सदा से भूखे रहे, इसलिए तो कुछ ही लोग सोने के महल खड़े कर सके।

भावना नायक (लेखिका)

वास्तव में गरीबों का नाजायज फायदा उठा कर कुछ लोग अमीर बन गए। हमेशा से ही हम भयानक हीनता की भावना से पीडि़त रहे हैं, हमारे अंदर हमेशा आत्मविश्वास की कमी रही है, और हम हमेशा किसी ना किसी का अनुसरण करते हुए आगे बढ़े हैं और खुद के अंतर्मन की आवाज को कभी पहचाना ही नहीं, इसलिए गरीब हैं। हम क्या कर सकते हैं?

हम अवश हैं, विवश हैं। हम किसी न किसी के पीछे भेड़ की तरह चलेंगे, नहीं तो हमारा दैनिक जीवन आगे बढ़ ही नही सकता, हम कभी पंडित, पुरोहितों का अंधानुकरण करेंगे, तो कभी किसी राजनेता की भक्ति में लीन हो जाएंगे। क्योंकि हीन व्यक्ति कर ही क्या सकता है। उस की सामर्थ्य कितनी? वह हमेशा किसी का पल्लू पकड़ कर ही चलेगा। वह तो भेड़ है, आदमी नहीं। ऐसा आदमी कभी उन्नति नहीं करेगा, हमेशा गरीब ही रहेगा।

आज हमारे देश में गरीब और गरीबी महज राजनीतिक हथकंडे बन के रह गए हैं। यह मुद्दे मंदिर में लगे उस घंटे के समान हो गए हैं, जिसे कोई राजनेता जब चाहता है तभी बजा कर चला जाता है। मेरे द्वारा बताए गए तथ्यों की पुष्टि इस बात से हो जाती है कि गरीबी का मुद्दा प्रथम प्रधानमंत्री श्रीमान जवाहरलाल नेहरू के समय में भी था और आज आजादी के 74 साल बाद भी हमारे देश के सामने सबसे बड़ी समस्या के रूप में गरीबी ही उपस्थित है। यह बताते हुए मुझे कोई विशेष आनंद की अनुभूति नहीं हो रही है बल्कि अत्यंत दुख पहुंच रहा है की यह कैसे संभव हो पाया? यह संभव इसलिए हो पाया क्योंकि इस देश की करोड़ों-करोड़ों आवाम, वह युवा देश का भविष्य कहते हैं, वह अपने आप को प्रजा समझ रहे है, वह इस बात को समझने में असमर्थ है कि हम एक लोकतांत्रिक देश में है और हम एक जागरूक नागरिक है।

हमारे देश में 67 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे अपना जीवनयापन कर रहे हैं। खासकर गांवों में 75 प्रतिशत अधिक गरीब लोग रहते हैं क्योंकि ये लोग थोड़ी सी जमीन पर खेती कर के अपना जीवनयापन करते हैं और बिना पानी के खेती मानसून पर निर्भर है। इतना ही नहीं, गांव में अधिकतर लोग शादियों में खर्च, मृतक पर खर्च और अन्य धार्मिक कार्यों पर खर्च करते हैं जिस से वे कर्ज में डूबे रहते हैं और हमेशा गरीब ही बने रहते हैं।

बचपन से ही सभी भारतवासियों के घरों में धर्म की घुट्टी पिलाई जाती है। जीवन में कुछ अजीब घटनाओं के डर और कुछ सवालों के जवाब न मिलने पर हम इन रहस्यों को अंधविश्वास का रूप दे देते हैं। देश में धर्मगुरुओं की समृद्ध परंपरा रही है। धर्मगुरुओं के भाषणों द्वारा लोगों को दान करने के लिए प्रेरित किया जाता है, क्योंकि दान करने को सब से बड़ा पुण्य माना जाता है। भोलेभाले गरीब लोग केवल मंदिरों में अपनी हैसियत से ज्यादा दान दे कर ही नहीं लुटते आए हैं, बल्कि वे ढोंगी बाबाओं के जगहजगह आश्रमों के जाल में फंसते रहे हैं। लेकिन नहीं “जान जाए पर, छद्म धर्म न जाए।”

निष्कर्ष के तौर पर यही कहना चाहूंगी की हमारा देश गरीब नहीं है, बल्कि हमारे देश की सरकारों की नीरसता एवं नागरिकों की कूपमंडूकता के कारण, भारत जैसा देश गरीब बना हुआ है।

पत्रकार,भावना नायक
(मुज़फ्फररपुर,बिहार)

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