सभ्य समाज के लिए नासूर बनते स्थानीय निकायों के चुनाव



*मुकेश शर्मा*
 पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री राजीव गांधी ने भारत जैसे लोकतांत्रिक देश मे जिन मूल्यों और सिद्धांतों को लेकर त्रिस्तरीय पंचायती राज की अवधारणा लागू की थी क्या बो अपने सिद्धांतों पर खरा उतर रही है ? यदि हां तो समाज में जातिवाद,पूंजीवाद,भृष्टाचार और अराजकता क्यों पनप रही है?क्या अपने पट्ठावाद के कारण इन सभी बातों को राजनीति की शह पर सरकारी संरक्षण प्राप्त है जिसमें आम जनता पिस रही है! सभ्य समाज के लिए जिस बात की कल्पना की थी उसपर तो ये व्यवस्था कतई खरी नहीं उतर रही है बल्कि ये सभी चुनाव भृष्टाचार और आतंक के पर्याय बन चुके हैं चाहे बो जिला  पंचायत अध्यक्ष या नगर पालिका, नगर  पंचायत,जनपद हो या ग्रामपंचायत के सरपंच का चुनाव सभी चुनावों में लाखों रु खर्च  हो रहे है तो खरीद फरोख्त होना लाजमी है क्योंकि जो जनप्रतिनिधि लाखों खर्च करके छोटा सा चुनाव जीतेगा उससे विकास या जनसेवा की उम्मीद नहीं कर सकते वह सरे बाजर बिककर जनता की भावनाओ से खुलेआम खिलवाड़ करेगा,और करे भी क्यों नहीं आखिर उसने भी तो वोट खरीदा है?

 त्रिस्तरीय चुनाव के बाद गाँव की सरकार तो आम ग्राम वाशियों  के मतों से बनजाती है, मगर मलाई दार और रुतबे दार वाला पद जिलापंचायत और जनपद अध्यक्ष का पद हासिल करने के लिए
अब इन दोनों चुनाव में जीते हुए सदस्य अपने जिलाध्यक्ष एवं जनपद अध्यक्ष का चुनाव करते हैं  लेकिन दोनों चुनावों में रोचक और मजेदार बात ये है कि इन चुनावों में प्रत्याशियों द्वारा मतदाताओं को मिले प्रमाण पत्र चुनाव से पहले ही लाखों रुपये में खरीद लिये जाते हैं और मतदान के दिन इनको वापिस करके मतदान स्थल पर प्रवेश कराकर अपने अपने पक्ष में मतदान करा लेते हैं 
" एक नजर  जिलापंचायत अध्यक्ष पर "

प्रत्येक जिले के विकास के लिए इस पद को पावर के साथ धन कुबेर का खजाना भी कहा जाता है क्योंकि प्रतिवर्ष इस पद पर आरूढ़ जिलाध्यक्ष की अनुमानित विकाश निधि लगभग 100 करोड़ से अधिक मिलती है जिसे पाने की होड़ में प्रत्येक प्रत्यासी एक सदस्य को लाखों रुपये एवं फोर व्हीलर तक का ऑफर देकर अपने पक्ष में मत हाशिल करने  की कोशिश करते हैं और ऐसे प्रत्याशियों को जिताने के समर्थन में माफिया से लेकर राजनेताओं और बिकाऊ मीडिया की विज्ञापन के नाम पर समर्थन की होड़ लगी रहती है ।
"अब एक नजर जनपद अध्यक्ष के चुनाव पर"
किसी भी जिले में यह पद दूसरे नम्बर के मलाई दार के नाम से जाना जाता है क्योंकि इस पद को मिलने से पूरे ब्लॉक के विकाश कार्य का जिम्मा इन्ही के हाथों में होता है और इस पद पर भी लगभग प्रति वर्ष 20 करोड़ का विकाश निधि आती है , जबकि दोनों पद को हाशिल करने के लिए कुछ गिने गिनाए जीते हुए सदस्यों का मत हाशिल करना होता है ।  जो जीते हुए पूरी संख्या के दो तिहाई का होता है ।

इसलिए सभी प्रदेश सरकारों को चाहिए कि  इन दोनों पदों पर आम जनता से चुनाव कराया जाय जैसे विधायक और सांसदों का होता है ।
या फिर  अब देश की सभी जाँच एजेंसियों जैसे NIA , ATS और CBI तथा NCB को चाहिए कि दोनों चुनाओ में लूटते सदस्यों और लुटाने वाले प्रत्याशियों पर कड़ी नजर रक्खे ।हाल ही में सम्पन्न उत्तरप्रदेश के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में यही हाल देखने को मिला क्या सरकार को इन सभी बातों से सबक लेने की जरूरत है?ताकि लुटती आवाम को बचाया जा सके!

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