खरी खरी : -भारत में बृक्षारोपण :एक फैशन



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मानसून के आते ही भारत में हर तरफ वृक्षारोपण की बहार आ जाती है. सरकारी और गैर सरकारी स्तर के अलावा निजी स्तर तक पर वृक्षारोपण समारोह आयोजित किये जाते हैं.वृक्षारोपण के लिए तमाम धनराशि भी खर्च की जाती है लेकिन भारत के वन क्षेत्र में कोई बढ़ोतरी नजर नहीं आती .वृक्षारोपण की ये दुर्दशा इस महत्वपूर्ण कार्य को फैशन के रूप में इस्तेमाल किये जाने की वजह से है .
भारत में वृक्षारोपण एक महती जरूरत है,क्योंकि तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण की वजह से भारत का हरियाली का क्षेत्र तेजी से घाट रहा है,इसका देश के पर्यावरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है ,लेकिन कोई भी इस मामले में गंभीर होने को राजी नहीं है. प्रधानमंत्री से लेकर पार्षद तक वृक्षारोपण करते हुए फोटो खींचने को ही परम धर्म मानते हैं .वृक्षारोपण को हमारे यहां विशेषज्ञों का काम नहीं माना जाता .हम मानसून के दिनों में या विश्व पर्यावरण दिवस के दिन पौधे रोपकर संतष्ट हो जाते हैं ,लेकिन बाद में कभी मुड़कर लगाए गए पौधों की तरफ नहीं देखते .
भारत में माना जाता है कि जिनके कर, कमल होते हैं उनके हाथों से लगाया गया पौधा अमरत्व को प्राप्त होता है,किन्तु हकीकत ये है कि देश में कर -कमलों द्वारा लगाए गए अधिकाँश पौधे या तो सूख जाते हैं या फिर उन्हें बकरियां खा जातीं हैं .मैंने खुद अपने प्रेस क्लब परिसर में स्वर्गीय माधव राव सिंधिया के कर -कमलों से बरगद का एक पौधा लगवाया था किन्तु आज उसका नामो-निशाँ नहीं है .ऐसा अक्सर इसलिए होता है क्योंकि हम पौधा लगाते समय बहुत सी जरूरी बातों का ध्यान ही नहीं रखते ,जो पौधे के जीवन के लिए आवश्यक हैं .
हमारे यहां खाली पड़ी जमीन पर कहीं भी,कोई भी पौधा लगाया जा सकता है ,कोई ये नहीं देखता कि किस मिट्टी में , कौन सा पौधा लगना चाहिए .कितनी दूरी पर लगना चाहिए,पौधे की सुरक्षा के क्या इंतजाम होना चाहिए,उनके लिए नियमित पानी की क्या व्यवस्था होना चाहिए ? हम तो बस पौधा लगते हैं,फोटो खिंचवाते हैं और फारिग हो जाते हैं .इस लापरवाही की वजह से हमारे यहां लगाए जाने वाले 80 फीसदी पौधे मर जाते हैं .हम बड़े जोर-शोर से पौधे लगते हैं ,लेकिन उनकी परवरिश के प्रति पूरी तरह उदासीन हो जाते हैं.पौधों की अकाल मौत का पाप हमारे सर पर होता है किन्तु किसी को ये महसूस नहीं होता .
उदाहरण के लिए बिहार सरकार अपने राज्य में वनक्षेत्र 15 फीसदी से बढाकर 17 फीसदी करने के लिए इस साल पांच करोड़ पौधे लगाएगी ,जाहिर है इसके लिए एक मोटा-तगड़ा बजट भी होगा.ऐसे ही बजट और योजनाएं हर प्रदेश सरकार की होती हैं.केंद्र सरकार की योजनाए अलग होती है .स्वयं सेवी संगठन सैकड़ों योजनाओं में लाखों लोगों को शामिल करने का दावा करते हैं ,लेकिन भारत की धरती हरी-भरी नहीं हो पाती .उलटे हमारे पास जितने वनक्षेत्र हैं वे भी साल-दर-साल कम होते जा रहे हैं. देश में सबसे ज्यादा वनक्षेत्र वाला मध्यप्रदेश अपने यहां के बक्स्वाहा वन से हीरे-जवाहरत पाने के लिए तीन लाख पौधों की बलि सहर्ष देने को तैयार है .
भारत में वृक्षों को लेकर जनता और सरकार दोनों का चरित्र दोगला है .सरकार कागजों पर वनक्षेत्र बढ़ाती है और जनता वृक्षों को पूजने का नाटक करती है लेकिन उनके प्रति रत्ती भर संवेदनशील नहीं होती .भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग वृक्ष पूजनीय माने जाते हैं. बरगद,पीपल,आंवला,बेरी,आम ,केला हमारे पूजनीय वृक्ष हैं .पीपल तो हमारे पूर्वजों का दूसरी योनियों का वास माना जाता है ,लेकिन ये सभी प्रजातियों के वृक्ष आपको खोजने  पर भी नहीं मिलेंगे .जो पुराने हैं वे या तो बीमार  होकर मर रहे हैं या उन्हें इरादतन मारा जा रहा है .
इन दिनों मै अमेरिका में वृक्षों के प्रति जांगरूकता देखता हूँ.यहां कोई किसी वृक्ष की पूजा का नाटक नहीं करता लेकिन वृक्षों को काटने और उनके संरक्षण के प्रति नियमों से मजबूती के साथ बंधा है .किसी आवासीय बस्ती में मौन सा पौधा लगाया जाएगा इसके स्पष्ट नियम हैं .आप अपने घर की परिधि   में जो चाहें सो पौधा लगा सकते हैं किन्तु सार्वजनिक स्थलों पर व ही पौधे लगाए जा सकते हैं जिनके लिए नियम अनुमति देते हैं .वृक्षारोपण से पहले पेड़ों की सिंचाई ,उनके रासायनिक उपचार की पूरी और पुख्ता व्यवस्था करना बेहद जरूरी है .
भारत  में बहुत कम नर्सरियां   ऐसी हैं जो पौधा बेचते समय उसके रोपण और संरक्ष्ण के साफ़-साफ निर्देश लिखित में खरीदार को देती हैं ,पौधों के जीवन की गारंटी का तो सवाल ही नहीं उठता.जबकि अमेरिका में सभी आवश्यक सूचनाएँ और कम से कम एक साल की गारंटी उपलब्ध है .हमारे यहां तो स्थानीय निकायों द्वारा पौधों की खरीद में ही घोटाले होते रहते हैं .अमेरिका में बड़े वृक्षों के स्थानांतरण की भी प्रामणिक तकनीक रोजमर्रा इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है.आप सोचेंगे कि मै अमेरिका का गुणगान कर रहा हूँ,लेकिन मेरा मकसद वृक्षों के प्रति मानसिकता उजागर करने का है .
भारत के पास अमेरिका के मुकाबले आधी भी जमीन नहीं है,ऐसे में भारत में सरकार और सरकार से ज्यादा जनता का जागरूक होना आवश्यक है. सारा काम कानों बनाकर नहीं हो सकता ,इसके लिए हमें अपना मन भी बनाना होगा .मप्र सरकार ने हाल में ही भवन निर्माण के लिए कुछ वृक्ष लगाने की शर्त लगा दी है .लेकिन इससे बात बनने वाली नहीं है.इसके लिए पहले हमें अपने एफएआर के नियम बदलना होंगे .वृक्षारोपण के लिए विशेषज्ञों की सेवाएं मुहैया कराना होंगी ,हमारे राष्ट्रीय और अंतर् राष्ट्रीय राजमार्गों और रेल लाइनों के आसपास सघन वृक्षारोपण की अपार संभावनाएं हैं.कुछ योजनाएं बनीं भी किन्तु   अधिकांश पर काम नहीं हो पाया .
मध्य्प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने सरकारी बंगले में हर हफ्ते एक वृक्ष लगाते हैं ,लेकिन इस बात की कोई गरानी नहीं है कि उनके हटने के बाद उनके लगाए गए वृक्षों की हिफाजत की जाएगी .ये आशंका इसलिए है क्योंकि ऐसा हमारे यहां होता है..आजादी से पीला उत्तर प्रदेश में नहरों और रजवाहों के किनारे इफरात में सलीके से छायादार और फलदार वृक्ष हुआ करते थे.आज उनमें से ज्यादातर नहीं हैं.कुछ उम्रदराज होकर काल कवलित हो गए और कुछ पर कुल्हाड़ी चल गयी.
कुल्हाड़ी हमारे देश में हरियाली की सबसे बड़ी दुश्मन है.
पुराने पेड़ बचाना   या काटना हमारी मानसिकता  से जुड़े विषय हैं सरकारें भले ही वृक्षों के प्रति निर्मम हों लेकिन समाज को हमेशा संवेदनशील रहना चाहिए .हमें अपने वृक्षों की विरासत बचाने के लिए सुंदरलाल बहुगुणा बनना पड़ता है .हमारा कोई कानून किसी वृक्ष के प्रति गंभीर और उदार नहीं है,जिम्मेदारी तो बहुत दूर की बात है .हमारे यहां वृक्षारोपण के नाम पर चोंचले यानि कर्मकांड ज्यादा होता है. हम पितृ और मातृवन लगाके सरकारी जमीने हड़प लेते हैं लेकिन वृक्षों के प्रति वफादार नहीं होना चाहते .इस बार यदि आप कोई पौधा लगाएं तो ध्यान कहें कि उसके लिए सही जगह चुनी जाये,उसकी सुरक्षा,खादपानी और दवा-दारू का भरपूर इंतजाम हो .यदि इनमें से एक की भी कमी हो तो कृप्पाकार वृक्षारोपण के किसी नाटक का हिस्सा न बनें.प्रकृति आपको कभी क्षमा नहीं करेगी.
@ राकेश अचल वरिष्ठ पत्रकार

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