ग्वालियर दुर्ग की नकली चमक

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आप इस आलेख के साथ जो तस्वीर देख रहे हैं वो ग्वालियर के ऐतिहासिक   दुर्ग की है. दुर्ग को किला भी कहते हैं.किला ही आम बोलचाल में ज्यादा  प्रचलित है. ग्वालियर की नौकरशाही इस किले पर झन्नाटेदार रोशनी कर स्थानीय जनता की आँखों में धूल झोंकना चाहती है की ग्वालियर सचमुच 'स्मार्ट' हो रहा है .ग्वालियर दुर्ग को रोशनी में नहलाने का ये काम स्मार्ट सिटी परियोजना का है .
ग्वालियर का किला बिजली की रोशनी के बिना भी पिछले एक हजार साल से ग्वालियर का नाम रोशन करता आ रहा है ,लेकिन इस किले को बचाने की कोशिशें पिछले कुछ सालों से एकदम बंद हो गयीं है .भारत के सर्वाधिक दुर्भेद्य किलों में से एक यह विशालकाय किला कई हाथों से गुजरा। इसे बलुआ पत्थर की पहाड़ी पर निर्मित किया गया है और यह मैदानी क्षेत्र से 100 मीटर ऊंचाई पर है। किले की बाहरी दीवार लगभग 2 मील लंबी है और इसकी चौड़ाई 1 किलोमीटर से लेकर 200 मीटर तक है। किले की दीवारें एकदम खड़ी चढ़ाई वाली हैं। यह किला उथल-पुथल के युग में कई लडाइयों का गवाह रहा है साथ ही शांति के दौर में इसने अनेक उत्‍सव भी मनाए हैं। इसके शासकों में किले के साथ न्‍याय किया, जिसमें अनेक लोगों को बंदी बनाकर रखा। किले में आयोजित किए जाने वाले आयोजन भव्‍य हुआ करते हैं किन्‍तु जौहरों की आवाज़ें कानों को चीर जाती है
ग्वालियर का ये किला आज अपनी दुर्दशा पर रोता है लेकिन इसके आंसुओं को पोंछने के बजाय इस पर बिजली की रंगीन रोशनी का मुलम्मा चढ़ा दिया गया .इस नकली रोशनी से ये असली किला कितने दिन रोशन रह पायेगा ,इसका इल्म किसी को नहीं है क्योंकि इस रौशनी पर खर्च होने वाली बिजली का खर्च अदा करने वाली संस्था का ही कोई भविष्य नहीं है .ग्वालियर के इस किले को बचने के लिए 35  साल पहले ग्वालियर विकास प्राधिकरण के तत्कालीन अध्यक्ष चंद्र मोहन नागौरी ने पहली बार एक योजना बनाई थी .वे इस किले के चारों और  हुए अतिक्रमण को हटवाकर यहां एक विशाल 'प्रियदर्शनी  पार्क ' बनवाना चाहते थे ,लेकिन ये हो न सका .वे यदि यहां किसी राजे-महाराजे के नाम पर यदि पार्क बनवाने की घोषणा करते तो शायद पार्क बन भी जाता अब तक .
ग्वालियर किले के चारों और अंधाधुंध अतिक्रमण कर रिहायशी बस्तियां बसाई जा चुकी हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण क़ानून को बलए ताक रखकर किले की तलहटी को सुनियोजित तरीके से लूट लिया गया है .शहर के अनेक कालोनाइजर,नेता और असामाजिक तत्व किले की इस तलहटी की जमीन पर अतिक्रमण कर करोड़पति बन गए हैं ,लेकिन किला लगातार कंगाल हो रहा है .केंद्र सरकार का पुरातत्व सनरसखन विभाग अतिक्रमण कर्ताओं को नोटिस देने और अदालत में कागजी लड़ाई लड़ने के सिवा कुछ नहीं कर सका .
ग्वालियर का ये किला राजस्थान के आमेर के किले से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं है लेकिन इस किले से न सरकार को कोई कमाई होती है और न शहर को इसके होने का लाभ मिलता है. किले के एक बड़े हिस्से  पर ग्वालियर के पुराने शासक सिंधिया परिवार द्वारा संचालित स्कूल का कब्जा है और दूसरे पर जबरन एक विशाल गुरुद्वारा दशकों पहले बना दिया गया है .बाकी किला वीरान है और अकेले में अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाता है .इस यतीम किले की बल्दियत पर भले ही केंद्र सरकार का नाम लिखा हो लेकिन इस पर न जाने कौन-कौन काबिज है .
ग्वालियर दुर्ग पर मौजूद ऐतिहासिक मान मंदिर के अलावा दर्जनों ऐसे स्मारक हैं जो इस किले के अतीत में चार चाँद लगाते हैं .किले का परकोटा इतना समृद्ध है की आप यकीन नहीं कर सकते किन्तु किला अनाथ है ,कोई उसकी तरफ देखने वाला नहीं है. इस किले पर बीते चालीस साल से रूप वे निर्माण की कोशिशें हो रहीं हैं लेकिन किले के दुश्मन ये काम नहीं होने देते. यदि इस किले के पास रोपवे होता तो यकीन जानिये की ये किला आमेर के किले से भी ज्यादा राजस्व कमाकर दे सकता था .स्मार्ट सिटी परियोजना किले को रोशनी में नहलाने के बजाय यदि रूप वे परियोजना को पूरा करने की दिशा में काम काम करती तो शायद इस किले का और ग्वालियर का ज्यादा भला होता .
ग्वालियर किले को रोशनी से नहलाये जाने पर मेरा कोई विरोध नहीं है ,मेरा कहना तो ये है कि ये पैसे की फिजूलखर्ची है.जब किले पर चढ़ना आज भी आम जनता के लिए सहज-सुलभ नहीं है तब इस तरह के इंतजाम करने का क्या फायदा ?किले की तलहटी में एक बहुमंजिला मार्किट तना खड़ा है,एक समाज विशेष ने किले की मूर्तियों पर कब्जा कर  अपना तीर्थ स्थल विकसित कर लिया है. एक समाजिक संस्था ने वहां पार्क बना डाला है. एक नेता जी ने वहां अपना कालेज खोल दिया है .ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जो किले के ऐश्वर्य को मिट्टी में मिला रहे हैं किन्तु कोई इसके खिलाफ खड़ा नहीं होना चाहता ,क्योंकि ये काम जोखिम का है. किले को बचने से वोटों का खजाना खाली होता है .हमारे नेता किला खो सकते हैं लेकिन वोटों का खजाना कभी नहीं खोना चाहते .
मैंने पहले भी लिखा है कि ग्वालियर  के साथ मजाक करने वाले बहुत से लोग हैं लेकिन उसके वास्तविक हितैषी गिने-चुने .ग्वालियर के पूर्व शासकों ने जितनी मेहनत अपनी पुश्तैनी सम्पत्ति को बचने में की उतनी यदि इस किले को बचने में भी की होती तो आज इस किले की स्थिति कुछ और ही होती .ग्वालेऔर के इस किले को ग्वालियर वाले ही बचा सकते हैं .उन्हें रौशनी के पीछे छिपे अँधेरे को और किले के आंसुओं को भी देखना चाहिए .ग्वालियर के वर्तमान सांसद श्री विवेक नारायण शेजवलकर से सवाल करना चाहिए कि उनके महापौर कार्यकाल में जिस रूप वे का शिलान्यास पूरी धूमधाम से हुआ था उस पर एक दशक बाद भी एक ईंट क्यों नहीं लगी ?क्या स्मार्ट सिटी का पैसा इस किले पर रूप वे बनाने के लिए खर्च नहीं किया जा सकता ?
ग्वालियर का नाम बदलने की मांग करने वालों को ग्वालियर की शान इस किले के लिए आवाज उठाना चाहिए .यदि ग्वालियर से ये किला हटा दिया जाये तो फिर ग्वालेऔर की कोई पहचान शायद ही बचे .जैसा किला ग्वालियर के पास है वैसा किला आज का कोई शासक तामीर करने की कल्पना  भी नहीं कर सकता ,इसलिए यदि ग्वालियर को स्मार्ट सिटी बनाना है तो पहले किले को बचाइए ,किला बच गया तो ग्वालियर भी बच जाएगा .
@ राकेश अचल

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