आलेख : सियासत में ' सर्टीफाइड गुण्डत्व '

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विषय बड़ा ही रोचक है. देश के विश्व विद्यालय चाहें तो इस नए,मौलिक,और लोकोपयोगी विषय पर नए शोधककार्य को अपनी मंजूरी दे सकते हैं. विषय है 'भारतीय राजनीति में सर्टीफाइड गुण्डत्व '.भारतीय राजनीति 1947  में 15  अगस्त को आधी रात के बाद से शुरू होती है .इसे आप अलग-अलग कालखंड में विभाजित कर सकते हैं .शोध इस बात पर होना चाहिए कि भारतीय राजनीति में राष्ट्रीयता ,धर्मनिरपेक्षता ,सम्प्रभुता के साथ ही गुण्डत्व का प्रवेश कब और कैसे हुआ ?गुण्डत्व का सर्टीफिकेशन कब और किसने किया ?
मुझे तो भारतीय राजनीति के पांच दशक ही याद हैं .मेरा ख्याल है कि आजादी के बाद की राजनीति को गुण्डत्व की आवश्यकता नहीं थी .उस समय राजनीति में नैतिकता ,आदर्श वगैरह से काम चल जाता था .राजनीति की भाषा भी भद्र और सारगर्भित थी .राजनीति में जो कुछ बदला सो 1975  के बाद बदला .आपातकाल का स्वाद चखने के बाद बदला .कांग्रेस के एकाधिकार को चुनौती देने के लिए जिस तत्व ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया,मेरे ख्याल से वो तत्व ही ' गुण्डत्व' था. बाद में बहुत से आंचलिक राजनीतिक दलों ने इसका सर्टिफिकेशन हासिल कर लिया .राष्ट्र के भीतर महाराष्ट्र में शिवसेना ने सबसे पहले ये सर्टिफिकेशन कराया ,इसका दावा खुद शिवसेना के प्रवक्ता श्रीमान संजय राउत ने किया है .
सर्टिफाइड गुण्डत्व के लिए प्रसिद्ध शिवसेना का जन्म 1966  में हुआ .सके संस्थापक महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध व्यंग्य चित्रकार स्वर्गीय बाला साहब ठाकरे ने की थी .मराठी अस्मिता की सुरक्षा और सांरक्षण के लिए गठित इस पार्टी ने जो आक्रामक शैली अपनाई उसे आज 'सर्टीफाइड गुण्डत्व' कहा जा रहा है .जहाँ तक मेरी जानकारी है की ' सर्टीफाइड गुण्डत्व 'का श्रीगणेश 1925  में राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ ने कर दिया था ,लेकिन संघ सियसत में पिछले दरवाजे से दाखिल हुआ .एक जमाने में भारत में सर्टीफाइड गुण्डत्व के प्रतीक माने जाते थे लेकिन आज वे हासिये पर हैं .देश के हर राज्य में इस तरह के सर्टीफाइड गुण्डत्व के पोषक संगठन हैं लेकिन वे शिवसेना की तरह सीना ठोंक कर इसे स्वीकार नहीं कर पाते .
भारत में हर साल 'वेलेंटाइन डे' पर वानर सेना का सर्टिफाइड गुण्डत्व आपने देखा ही होगा. सर्टिफाइड गुण्डत्व का इस्तेमाल गौरक्षा के नाम पर भी हो सकता है और बंगाल में बंगाली अस्मिता बचने के नाम पर भी तृणमूल कांग्रेस के रूप में .सर्टिफाइड गुण्डत्व एक हकीकत है जो राज्य बदलने   के साथ ही अपनी सूरत भी बदल लेता है .यूपी में इसकी शक्ल अलग है तो बिहार में अलग,बंगाल में अलग है तो असम में अलग .सर्टिफाइड गुण्डत्व अब लोकतंत्र की अनिवार्य किन्तु अघोषित शर्त बन चुका है .ये आपके ऊपर है की आप इसे कैसे लेते हैं ?
राजनीति से आज यदि सर्टीफाइड गुण्डत्व को अलग कर दिया जाये तो कुछ बचिएगा ही नहीं ,क्योंकि आज इस सर्टिफाइड गुण्डत्व के साथ हजारों,नहीं लाखों,करोड़ों लोग सियासत में हैं .सर्टिफाइड गुण्डत्व का अर्थ होता है की क़ानून अउ सामविधान से हटकर राजनीति करना और उसके लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा देना .मेरा ख्याल है की देश में जब विवादित ढांचा गिराया गया तब यही एक तत्व था जो एक निर्जीव इमारत को अपना जानी-दुश्मन मानकर उस पर टूट पड़ा था .अगर ये तत्व न होता तो भला इतना पुराना ढांचा कोई तोड़ता ?
सर्टिफाइड गुण्डत्व का एक अर्ह ये भी होता है की इस तत्व को राज सत्ता का संरक्षण प्राप्त है.यदि ये न होता तो न वेलेंटाइन डे पर उत्पात होते और न गौवंश  की रक्षा के नाम पार मॉब लिंचिंग होती .सर्टिफाइड गुण्डत्व ही किसी जमाने में एक महिला नेत्री का चीरहरण करने का प्रयास कर सकता है .यही वो तत्व है जो दक्षिण में एक बूढ़े नेता को आधी रात उसके घर से उठाकर जेल में डाल सकता है. ये ही वो तत्व है जो पूरे देश को 19  महीने  तक राष्ट्रीय जेल में बदल सकता है .कहने का आशय ये है की सर्टिफाइड गुण्डत्व किसी एक राजनीतिक दल की ख़ुसूसियत नहीं है. 
किसी भी देश में सर्टिफाइड गुण्डत्व कुछ भी कर सकता है.कुछ भी से मतलब कुछ भी ,क्योंकि इस तत्व का असल मकसद एक नया इतिहास लिखना होता है .अब ये इतिहास स्याही से लिखा जाये या किसी खून से ,कोई फर्क नहीं पड़ता .आज भी ये कोशिशें जारी हैं .कल भी इन पर रोक नहीं लगेगी क्योंकि ये तत्व सर्टीफाइड हो चुका है .ये सर्टिफिकेट उस तरह का नहीं है जिसे की छिपाया जाये ! इसका तो ऐलान किया जाता है,शिवसेना के संजय राउत की तरह .मुझे लगता है की संजय राउत इस सर्टिफाइड गुण्डत्व का एक चेहरा भर हैं .आप ऐसे चेहरे हरेक दल में देख सकते हैं .
अब सवाल ये है की जब संजय राउत सर ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया है की उनकी पार्टी घोषित रूप से सर्टिफाइड गुंडों की पार्टी है तो क्या ये भी मान लिया जाये की महाराष्ट्र की सरकार में सर्टिफाइड गुंडे शामिल हैं. ऐसे में क्या केंद्र सरकार की हिमत है की वो इस सरकार को बर्खास्त करदे?.महीन है साहस,सरकार केवल बंदर घुड़कियाँ दे सकती है,जैसी की आजकल बंगाल सरकार को दी जा रहीं हैं .सियासत के ये दो बदशक्ल चेहरे हैं ,जिनका हम और हमारा क़ानून कुछ नहीं बिगड़ सकता .ये सर्टिफाइड गुंडे आज एक सरकार के साथ हैं तो कल किसी दूसरी सरकार के साथ खड़े दिखाई देंगे .
देश की 72  साल की आजादी के बाद भी भारत का मतदाता इतना उदार,भोला और बावला है की सियासत से इन सर्टिफाइड गुंडों के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल सकता .बोलना तो दूर इनका बहिष्कार भी नहीं कर सकता .सर्टिफाइड गुंडे इस कमजोरी से वाकिफ हैं और शायद इसीलिए ये तत्व दिनोंदिन मजबूत होते जा रहे हैं .मुझे हैरत होती है की सियासत में काम करने वाले इतनी बेशर्मी कहाँ से लाते हैं की सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार कर लेते हैं की वे-'सर्टिफाइड गुंडे हैं'. जाहिर है की इस देश में क़ानून का राज नहीं बल्कि राम का राज है,जो आदमी जो चाहे से कर गुजरे कोई कुछ कहने या करने वाला नहीं है .
सोशल मीडिया की मुश्कें कसने के लिए उतावली हमारी सरकार राउत के खिलाफ कोई कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती .
हम गर्व के साथ पूरी दुनिया को बता सकते हैं की हम उस देश के वासी हैं जिस देश में राजनीति सर्टिफाइड गुंडों के सहारे चलती  है .
@ राकेश अचल

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