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आज लीक से हटकर बात करते हैं उस कागज की जिसे काला करते हुए इनसानों की न जाने कितनी पीढ़ियां बीत चुकी हैं.कहते हैं कि सबसे पहले कागज़ का आविष्कार चीन में हुआ। 201 ई.पू. हान राजवंश के समय चीन के निवासी “त्साई-लुन” ने कागज़ का आविष्कार किया। इस आविष्कार से पहले बाँस पर और रेशम के कपड़े पर लिखा जाता था। रेशम बहुत महँगा था और बाँस बहुत भारी इसलिए “त्साई-लुन” के मन में आया कि कुछ ऐसा बनाया जाए जो हल्का और सस्ता हो। तब उसने भांग, शहतूत के पत्ते, पेड़ की छाल तथा अन्य तरह के रेशों से कागज़ का निर्माण किया। उसके बाद कागज़ का इस्तेमाल सम्पूर्ण विश्व में होने लगा इस अनोखे आविष्कार के लिए त्साई-लुन को “कागज़ का संत” कहा जाने लगा।
कागज के जन्म को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं हैं. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि कागज़ का पहला प्रयोग मिस्र में हुआ। पेपिरस एंटीकोरियम नामक घास द्वारा कागज़ बनाया गया जिसे पेपिरस या पेपिरी कहा जाता था। लेखक “नैश” के “एकूसोड्स” ग्रन्थ से पता चलता है कि ईशा से लगभग चौदह सौ वर्ष पूर्व मिस्र में पेपिरी का निर्माण हुआ। उसके बाद रोम के लोगों ने पेपिरी बनाई।भारत में सबसे पहले कागज़ का निर्माण और प्रयोग सिन्धु सभ्यता के दौरान हुआ। आगे चलकर भारत में कागज़ बनाने का पहला कारखाना कश्मीर में “सुलतान जैनुल आबिदीन” (1417-1467 ई.में ) ने लगवाया। आधुनिक तकनीक पर आधारित कागज़ का सबसे पहला कारखाना हुगली नदी के तट पर 1870 में कलकत्ता के निकट ‘बाली’ नामक स्थान पर लगाया गया। इसके बाद टीटागढ़ (1882), बंगाल (1887), जगाधरी (1925), गुजरात (1933) आदि प्रदेशों में कागज़ बनाने के कारखाने लगाए गए।
कागज अब केवल लिखने का कागज नहीं रहा.कागज का परिवार भी लगातार बढ़ रहा है.अब कागज मुद्रा तो है ही साथ ही बांड कागज़, बुक कागज़, चीनी कागज़, फोटो कागज़, इंकजेट कागज़, सूत कागज़, क्राफ्ट कागज़, ड्राइंग काज, वैक्स कागज़, वाल कागज़ आदि। कागज़ से विभिन्न प्रकार की उपयोगी वस्तुएँ जैसे किताबें ,कापियाँ, कलेंडर, बैग, पतंग, डायरी आदि बनाए जाते हैं। काहाज टायलेट से लेकर वॉलेट तक हमारे साथ है
आज कागज का निर्माण मुख्यतः घास, बाँस, लकड़ी, पुराने कपड़ों, गन्ने की खोई से हो रहा हैं। कागज़ निर्माण में सेल्यूलोस बड़ी भूमिका निभाता है। सेल्यूलोस एक विशेष प्रकार का रेशा हैं। सेल्यूलोस एक कार्बनिक यौगिक हैं। यह तीन प्रकार का होता है अल्फ़ा सेल्यूलोस, बीटा सेल्यूलोस, गामा सेल्यूलोस। रुई में 99 प्रतिशत अल्फ़ा सेल्यूलोस होता है । पौधों में सेल्यूलोस नाम का कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है जिससे पौधों की कोशिकाएँ बनती हैं । यह पेड़ के तने में पाया जाता है। जिस पौधे में सेल्यूलोस की मात्रा अच्छी होगी उससे उतना ही अच्छा कागज बनेगा । कपास में भी सेल्यूलोस बहुत मात्रा में होता हैं। किन्तु महँगी होने के कारण कागज़ निर्माण में इसका इस्तेमाल नहीं होता। इसलिए कपास का प्रयोग कपड़ा बनाने में किया जाता है । पौधों में सेल्यूलोस के साथ-साथ लिग्रिन और पेक्टिन, खनिज लवण, वसा, गोंद, प्रोटीन, आदि भी पाया जाता है इसलिए वृक्ष के तने से सबसे अच्छा कागज़ बनता है ।कागज मुख्यतः बाँस, देवदार, भोज, पपलर, फ़र, सफेदा आदि वृक्षों के तने से कागज़ बनाया जाता हैं।
कोई माने या न माने किन्तु मेरी धारणा है कि कागज अब संस्कृति है,सभ्यता है ,परम्परा है ,जीवन है .कागज के बिना दुनिया रुक सकती है .आप कह सकते हैं कि हम ,हमारा समाज सब कुछ कागजी हो गया है .आंकड़े कागजी,योजनाएं कागजी,सपने कागजी ,लड़ाइयां कागजी,समझौते कागजी .रहन-सहन कागजी .काहजी होना यानि दिखावटी होना है,सजावटी होना है .हम सब कागज के फूलों जैसे हैं .कागज के फूलों में रंग और आभा तो होती है लेकिन सुगंध नहीं होती.हमारे यहां कागज का शेर,मिटटी का माधौ और गोबर गणेश को एक जैसी मान्यता और सम्मान प्राप्त है ,हम कागज को सरस्वती की कृपा भी मानते हैं इसलिए उसे पैरों में नहीं आने देते ,लेकिन दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कागज से ही अपनी गंदगी साफ़ कर लेता है ,उसे जल की जरूरत ही नहीं पड़ती .
बीते चार-पांच दशकों मेमें दुनिया भर में कागज की खपत में 400 फीसदी की वृद्धि हुई है जिससे वनों की कटाई में वृद्धि हुई है, 35 फीसदी पेड जो काटे जाते हैं वो पेपर के निर्माण के लिये इस्तेमाल किये जा रहे है। अधिकांश पेपर कंपनियों ने वनों को फिर से वन्य बनाने में मदद करने के लिए पेड़ों के पेड़ लगाए हैं। 10 फीसदी से भी कम लकड़ी के गूदे पुरानी विकास जंगलों के काट्ने से आता है, लेकिन सबसे विवादास्पद मुद्दों में से एक है।
इस समय मै जिस अमेरिका में हूँ वहां पेपर अपशिष्ट हर साल उत्पादित कुल कचरे का 40 फीसदी तक का हिस्सा है, जो अकेले अमेरिका में प्रति वर्ष 71.6 मिलियन कागज अपशिष्ट को जोड़ता है। अमेरिका का एक सधरण कार्यालय कर्मचारी करीब 31 कगज के पन्ने छापता है। अमेरिकी प्रति वर्ष 16 अरब पेपर कप उपयोग करते हैं।अमरीकी कागज का उपयोग से ज्यादा दुरूपयोग करते हैं
कागज को सफेद (ब्लीच) करने के साधारण तरीके पर्यावरण मे अधिक क्लोरीन सहित रासयन (क्लोरिनेटड डाइऑक्सिन भी) छोडते है। डाईऑक्सिन को दृढ़ पर्यवरणीय प्रदूषक माना जता है, जिसके प्रयोग पर अन्तर्रष्ट्रिय नियंत्रण है। डाईऑक्सिन अत्यधिक विषैले होते हैं, और मानव पर स्वास्थ्य प्रभाव में प्रजनन, विकास, बिमारी से प्रतिरक्षा और हार्मोन संबंधी समस्याएं शामिल हैं। यह कैंसरजनक है। मनुष्यों मे 90 प्रतिशत डाईऑक्सिन भोजन के द्वारा आता है, ख़ास तौर पर, मांस, दूध, मछली और शंख जैसे भोजन से आता है, क्योंकि पशुओं के चरबी में डाईऑक्सिन जमा होते हैं।
मेरी ओर से इस कागज के सम्मान में ये गजल हाजिर है.उम्मीद है की ये कागज के साथ-साथ आपको भी पसंद आएगी.
कागज
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डूब रही है नाव हमारी कागज की
हमने की ही थी तैयारी कागज की
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लहरों से कब तक लड़ सकता है कागज
कोई तो समझे लाचारी कागज की
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दुनिया में कागज ही कागज पुजता है
दुनिया है देखो आभारी कागज की
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कम करके मत आंक लीजिये कागज को
होती है तलवार दुधारी कागज की
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बाग़-बाग़ दिल हो जाता है सुनते ही
बहुत सुरीली ही किलकारी कागज की
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बात तुम्हारी बहुत अलग है खेल गए
खेल नहीं सकता मै पारी कागज की
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कागज बड़ी जरूरत है इनसानों की
दुनिया है बेहद आभारी कागज की
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जंगल के जंगल उजाड़ हो जाते हैं
चलती है जब-जब भी आरी कागज की
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@ राकेश अचल
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