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रामू की याद बनाए रखने के लिए@राजेश बादल
दिल की गहराइयों से आप सभी छतरपुर के पत्रकारों और संपादकों का आभार । ख़ास तौर पर भाई श्याम किशोर अग्रवाल, भाई सुरेंद्र अग्रवाल, भाई अजय दोसाज़ भाई विभूति शर्मा,भाई हरी अग्रवाल,रवींद्र व्यास ,दिनेश निगम,पंकज चतुर्वेदी,रामकिशोर अग्रवाल और अनेक अपने उन साथियों का ,जो हम लोगों के छतरपुर छोड़ने के बाद पत्रकारिता में आए और हम लोगों को दिल में बसाए बैठे हैं ।
आज मेरे बचपन से अब तक के प्रिय साथी,दोस्त और भाई रामू ( शिव अनुराग पटेरिया ) ख़ुद आपकी इन भावनाओं को सम्मान देने के लिए हमारे बीच नहीं हैं । अगर होते तो वे भी आप सबके प्रति कृतज्ञ होते । मैं तहे दिल से अपनी ओर से ,साथी रामू के परिवार की ओर से आप सबका आभार प्रकट करता हूं ।आज सुबह छतरपुर के समाचार पत्रों ने जिस तरह अपनी मिट्टी के इस लाड़ले को याद किया है,उसने मुझे भावविह्वल कर दिया है । आज के दौर में कौन किसको याद करता है ।आपके अहसानों तले लोग भी मुंह फेर लेते हैं ।लेकिन आप सबने यादों की घाटियों में हम लोगों को याद रखा है ,यही बहुत है । हम लोग याने मैं, रामू और विभूति जब छतरपुर में पत्रकारिता का ककहरा सीख रहे थे ,तो उन दिनों भाई श्याम किशोर अग्रवाल, सुरेंद्र अग्रवाल और लखन चौरसिया जी साथ साथ थे और प्रचंड ज्वाला निकालते थे ।आपातकाल लगा था ।छतरपुर के अख़बार जगत में श्रीनारायण बुधौलिया, महेंद्र कुमार मानव,रामानंद जौर, कॉमरेड जगदीश तिवारी ,विजय बहादुर सिंह बंगाली , विनीत खरे और भरत श्रीवास्तव जैसे वरिष्ठ लोग छाए हुए थे । किन्हीं कारणों से प्रचंड ज्वाला से श्याम और सुरेंद्र जी का रिश्ता टूटा । लखन चौरसिया जी नगर पालिका अधिकारी बन गए । इसके बाद हम लोग श्याम जी के शुभ भारत, सुरेंद्र जी के राष्ट्र भ्रमण और अजय दोसाज़ के क्रांति कृष्ण समाचार पत्र के जन्म के साक्षी बने । कुछ दिनों के लिए दैनिक खजुराहो बुलेटिन भी बिजली की तरह चमका और बंद हो गया । हम तीनों कॉलेज की पढ़ाई के बाद साइकिलों से शाम को निकलते और शुभ भारत में फड़ जम जाती ।कभी कभी वहाँ श्रीनिवास शुक्ल जी, रामस्वरूप खरे, शिव नारायण खरे,राजा संतोष सिंह बुंदेला,नारायण दास पिपरैया और सुरेंद्र शर्मा शिरीष जैसे सम्मानित महानुभाव भी आकर राजनीतिक चर्चाओं में शामिल हो जाते थे।शुभ भारत से हमारी तिकड़ी चौक बाज़ार में गोवर्धन टाकीज़ के पास इस्लाम जी के प्रेस में सुरेंद्र जी के राष्ट्र भ्रमण कार्यालय जाती। बीच में हमारे वरिष्ठ मित्र ओम प्रकाश अग्रवाल याने आर के स्टूडियो का पड़ाव होता था ।एक कप चाय भी होती थी ।फिर राष्ट्रभ्रमण जाते और वहाँ से निकलकर जड़िया जी के यहाँ रबड़ी खाते। उसके बाद बस स्टैंड पर अजय दोसाज़ के क्रांति कृष्ण होती हुई रात दस बजे के आसपास महेश टाकीज़ के सामने चाट के एक ठेले पर चाट खाकर अपने अपने घर चली जाते । तीनों अख़बारों के लिए हम लोग मिलकर कोई न कोई एक्सक्लूसिव ख़बर प्रतिदिन दिया करते थे ।कभी कभी श्याम जी या सुरेंद्र जी को किसी काम से बाहर जाना होता तो वे हम जैसे नौसिखिए पत्रकारों के भरोसे अपना अख़बार छोड़ जाते और हम लोग उस दायित्व को पूरी ईमानदारी से निभाते थे ।जाते समय सिर्फ़ एक लाइन बोलते थे - बाहर जा रहे हैं। अख़बार देख लेना। भाई सुरेंद्र और श्याम को यह दास्तान याद होगी ।इन्हीं दिनों भाई राकेश शुक्ला भी वकालत करते करते युगधर्म के ज़रिए पत्रकारिता में कूद पड़े । फिर फ़ौलादी कलम लेकर डॉक्टर रज्जब ख़ान का प्रवेश हुआ । यही वह काल खंड है ,जब छतरपुर कांड हुआ ।सारे पत्रकार कमोबेश साथ साथ थे ।शुभ भारत में गोलीकांड की जाँच रिपोर्ट पटेरिया के नाम से छपी। हम सबका उत्पीड़न शुरू हो गया। फिर भोपाल पहुँचे। वहाँ कई दिन सड़कों पर भटके। आख़िरकार विधानसभा में ज्यूडीशियल इन्क्वारी का ऐलान हुआ। जाँच आयोग और प्रेस कौंसिल ने हमारा पक्ष सही ठहराया।और भी अनेक कहानियाँ हैं। हम लोगों ने इंदिरा गांधी ,हेमवती नंदन बहुगुणा,जगजीवन राम, जॉर्ज फर्नांडिस, विद्या चरण शुक्ल, प्रकाश चंद्र सेठी, अटल बिहारी वाजपेई,बाला साहेब देवरस और नीलम संजीव रेड्डी जैसे शिखर पुरुषों के साक्षात्कार लिए और उनके कार्यक्रम कवर किए ।
अस्सी इक्यासी में स्वर्गीय राजेंद्र माथुर के निर्देश पर मैं इंदौर में नई दुनिया ज्वॉइन करने चला गया । कुछ समय बाद वहां संपादकीय विभाग में कुछ स्थान रिक्त हुए ।मैनें माथुर जी से भाई रामू और विभूति को भी टीम में शामिल करने का निवेदन किया ।उसे स्वीकार करते हुए माथुर जी ने दोनों मित्रों को इंदौर बुलाया ।साक्षात्कार हुआ और दोनों ने एक ही दिन नई दुनिया ज्वॉइन कर लिया । हम लोगों की तिकड़ी फिर इंदौर में धमाल कर रही थी ।हम एक ही घर किराए का लेकर रहते थे -सुदामानगर में। उसका नंबर था -ए -52 . उस घर में जब तक हम लोग रहे ,कभी ता ला ही नहीं लगता था। इधर छतरपुर से हमारे जाने के बाद हरी अग्रवाल ने छतरपुर भ्रमण शुरू किया और पंकज चतुर्वेदी, रवींद्र व्यास,दिनेश निगम,सुमति जैन और नायडू जैसे कई साथियों ने उत्तराधिकार संभाल लिया ।
आज रामू नहीं हैं तो सारी यादें एक फ़िल्म की तरह चल रही हैं ।बहुत से क़िरदार हैं। बहुत सी यात्राएँ हैं,जो स्कूटरों पर करते थे।बहुत से प्रसंग बताने लायक हैं और बहुत से न बताने लायक। हम लोगों के सफ़र में छतरपुर एक तीर्थ से कम नहीं है।अब भाई पटेरिया नहीं हैं तो उनकी यादें हैं। आप सब लोगों ने उन्हें याद रखा - एक बार पुनः हार्दिक आभार और धन्यवाद।
नीचे कुछ चित्र हैं ।इनमें एक 1969 का है ,जब हम अनगौर के स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ते थे । एक चित्र महाराजा कॉलेज का है जब रामू एम ए फाइनल इतिहास में मेरे छात्र थे ।इसमें रामू के बगल में पूर्व सांसद जितेंद्र सिंह बुंदेला भी हैं ।जितेंद्र भी इस दुनिया में नहीं रहे । जितेंद्र के साथ श्रीकांत पांडे हैं ,जो एक आइए एस के रूप में अभी सेवानिवृत हुए हैं । मैं नीचे कुर्सी पर हूं ।सबसे ऊपर की लाइन में ये तीनों हैं । एक चित्र मेरे जन्मदिन पर समोसा पार्टी का है ।उसमें सेवानिवृत आई ए एस एल एस बघेल भी हैं ,जो उन दिनों जन संपर्क अधिकारी थे । राजेश बादल जी की एफबी से साभार
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