स्मृति शेष : वे शिव के ही नहीं सबके अनुरागी थे

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सच मानिये साथी शिव अनुराग पटैरिया के निधन की खबर से दिल बैठ गया. वे हमारी पीढ़ी के शानदार पत्रकारों में से एक थे. हमारा उनका रिश्ता बुंदेलखंडी वाला था. मुझसे उम्र में गिनकर सवा साल बड़े शिव अनुराग पटैरिया ने छतरपुर से पत्रकारिता की जो यात्रा शुरू की थी वो आज इंदौर में समाप्त हो गयी .हमने लगभग एक साथ कलम का सिपाही बनना तय किया था .उन्होंने जहाँ भी रहे लम्बी पारी खेली .बुंदेलखंडी होने के नाते वे सर्वगुण सम्पन्न थे. सियासत और नौकरशाही में उनका कोई शत्रु था ही नहीं.जिससे रिश्ते बनाये उससे अंत तक निभाया .असहमति के बावजूद वे ऐसा करते रहे और जिसे छोड़ा उसकी और मुड़कर देखा नहीं .नयी दुनिया के बाद वे लोकमत से जुड़े और अंत तक जुड़े रहे. .टकराव उनके स्वभाव में था नहीं. अपनी वरिष्ठ और कनिष्ठ पीढ़ी से उनके एक जैसे रिश्ते थे इसलिए उन्हें कभी कोई दिक्क्त पेश नहीं आयी. 
एक पत्रकार के रूप में वे जो पासकते थे उन्हें मिला और जो नहीं मिला उसके पीछे वे भागे नहीं .उनका छोटा सा अपना संसार खूबसूरत था .मै जब भी भोपाल जाता उनसे मुलाकात होती ही थी.आखरी बार दफ्तर  में बुंदेली बौछार चैनल के लिए हम दोनों एक परिचर्चा में साथ-साथ थे.उन पर मेरा बहुत उधार था. वे अपने हर नए प्रकाशन के बाद मुझे अपनी किताब मुझे देने का वादा करते लेकिन मेरे ही आलस्य से ये वादा कभी पूरा हुआ नहीं .अब ये अधूरा ही रहेगा .वे केवल भगवान शिव के ही नहीं बल्कि सभी के अनुरागी थे .
शिव अनुराग के जाने से किसी का कोई नुक्सान हुआ हो या नहीं लेकिन हमारी बुंदेली और बुंदेलखंड का तो बहुत  नुक्सान हुआ है.पटैरिया जी के प्रति श्रृद्धांजलि शब्द का इस्तेमाल ही कलम को काठ मारने जैसा है. लेकिन सत्य को कौन झुठला सकता है. वे अब नहीं हैं लेकिन हमारे दिलों में हमेशा रहेंगे .जब भी लोकमत की ईमारत के आसपास से गुजरूँगा ,लगेगा की अभी पटैरिया जी की आवाज सुनाई देगी-अरे !  अचल जू महाराज ! कितै बच कें जा रये '

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