वाल्मीकि रामायण में ही इस प्रश्न का उत्तर भी है ....रामायण पाठ करते समय के जितने नियम है, वह सभी नारदजी की वाणी में आप भी पढ़ें ....
मेने वही उत्तर आपके समक्ष हूबहू रख दिया है, जिसमे स्वयं नारद जी ( भगवान विष्णु ) ही रामायण कथा के श्रवण की महिमा पूरे संसार को बता रहे है ।। मेने संस्कृत श्लोकों के साथ पूर्ण वर्णन किया है, ताकि हमारे पाठकों को संतोष भी हो, एवं वह इस पोस्ट के माध्यम से ही भवसागर को पार कर जाएँ.....
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"श्रीगणेशाय नमः"
नारद जी से रामायणका यह माहात्म्य सुनकर मुनीश्वर सनत्कुमार बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने मुनिश्रेष्ठ नारदजीसे पुनः जिज्ञासा की, की आप मुझे रामायण पाठ की विधि एवं मुहूर्त आदि भी बतलावे, जिससे मैं भी परमसिद्धि को प्राप्त हो सकूं ..॥१॥
रामायणस्य माहात्म्यं कथितं वै मुनीश्वर।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि विधिं रामायणस्य च॥२॥
सनत्कुमार बोले - मुनीश्वर ! आपने रामायणका माहात्म्य कहा । अब मैं उसकी विधि सुनना चाहता हूँ ।
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(सनत्कुमार जी नारद जी से पूछ रहे है है -)
एतच्चापि महाभाग मुने तत्त्वार्थकोविद ।
कृपया परयाविष्टो यथावद् वक्तुमर्हसि ॥३॥
महाभाग मुने ! आप तत्त्वार्थ - ज्ञान में कुशल हैं ; अतः अत्यन्त कृपापूर्वक इस विषयको यथार्थ रूपसे बतायें।
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नारद उवाच- नारद जी अब उत्तर देते है
रामायणविधिं चैव शृणुध्वं सुसमाहिताः ।
सर्वलोकेषु विख्यातं स्वर्गमोक्षविवर्धनम् ॥४॥
नारदजीने कहा - महर्षियो ! तुमलोग एकाग्रचित्त होकर रामायणकी वह विधि सुनो , जो सम्पूर्ण लोकों में विख्यात है । वह स्वर्ग तथा मोक्ष - सम्पत्ति की वृद्धि करने वाली है ॥४॥
( नारद जी यहां एक ही श्लोक में रामायण पाठ के लाभ का सम्पूर्ण सार लिख दिया है । मोक्ष के अलावा सम्पति वृद्धि की भी बात नारद जी ने की है, सम्पति की कमी से ही आज का भरतखण्ड दुःखी है, अतः किसी भी परिवार को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए रामायण का पाठ अवश्य करना चाहिए )
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नारद जी अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते है ..
विधानं तस्य वक्ष्यामि शृणुध्वं गदतो मम।
रामायणकथां कुर्वन् भक्तिभावेन भावितः॥५॥
मैं रामायणकथा - श्रवणका विधान बता रहा हूँ ; तुम सब लोग उसे सुनो । रामायणकथा का अनुष्ठान करने वाले वक्ता एवं श्रोता को भक्ति भावसे भावित होकर उस विधान का पालन करना चाहिये ॥५॥
येन चीर्णेन पापानां कोटिकोटि : प्रणश्यति ।
चैत्रे माघे कार्तिके च पञ्चम्यामथवाऽऽरभेत् ॥६ ॥
उस विधिका पालन करनेसे करोड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं ।चैत्र , माघ तथा कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको कथा आरम्भ करनी चाहिये ॥६॥
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नारदजी आगे कहते है :-
संकल्पं तु ततः कुर्यात् स्वस्तिवाचनपूर्वकम् । अहोभिर्नवभिः श्राव्यं रामायणकथामृतम् ॥७ ॥
पहले स्वस्तिवाचन करके फिर यह संकल्प करे कि 'हम नौ दिनोंतक रामायणकी अमृतमयी कथा सुनेंगे ।।
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अद्य प्रभृत्यहं राम शृणोमि त्वत्कथामृतम्।
प्रत्यहं पूर्णतामेतु तव राम प्रसादतः ॥८॥
फिर भगवान से प्रार्थना करे - ' श्रीराम ! आज से
प्रतिदिन मैं आपकी अमृतमयी कथा सुनूँगा।
यह आपके कृपाप्रसादसे परिपूर्ण हो'॥८॥
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प्रत्यहं दन्तशुद्धिं च अपामार्गस्य शाखया।
कृत्वा स्नायीत विधिवद् रामभक्तिपरायणः॥९॥
नित्यप्रति अपामार्गकी शाखासे दन्तशुद्धि करके रामभक्तिमें तत्पर हो विधिपूर्वक स्नान करे॥९॥
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स्वयं च बन्धुभिः सार्द्ध शृणुयात् प्रयतेन्द्रियः।
स्नानं कृत्वा यथाचारं दन्तधावनपूर्वकम्॥१०॥ शुक्लाम्बरधरः शुद्धो गृहमागत्य वाग्यतः।
प्रक्षाल्य पादावाचम्य स्मरेन्नारायणं प्रभुम् ॥११ ॥
अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर भाई - बन्धुओंके साथ स्वयं कथा सुने । पहले अपने कुलाचार के अनुसार दन्तधावन पूर्वक स्नान करके श्वेत वस्त्र धारण करे और शुद्ध हो घर आकर मौन भाव से दोनों पैर धोने के पश्चात् आचमन करके भगवान् नारायणका स्मरण करे॥१०-११ ॥
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नित्यं देवार्चनं कृत्वा पश्चात् संकल्पपूर्वकम् । रामायणपुस्तकं च अर्चयेद् भक्तिभावतः॥१२॥
फिर प्रतिदिन देवपूजन करके संकल्पपूर्वक भक्तिभावसे रामायणग्रन्थकी पूजा करे॥१२॥
आवाहनासनाद्यैश्च गन्धपुष्यादिभिर्वती।
ॐ नमो नारायणायेति पूजयेद् भक्तितत्परः॥१३ ॥
व्रती पुरुष आवाहन , आसन , गन्ध , पुष्प आदि के द्वारा ' ॐ नमो नारायणाय ' इस मन्त्रसे भक्तिपरायण होकर पूजन करे ॥१३॥
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एकवारं द्विवारं वा त्रिवारं वापि शक्तितः।
होमं कुर्यात् प्रयत्नेन सर्वपापनिवृत्तये ॥१४ ॥
सम्पूर्ण पापोंकी निवृत्तिके लिये अपनी शक्तिके अनुसार एक , दो या तीन बार प्रयत्नपूर्वक होम करे ।
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एवं यः प्रयतः कुर्याद् रामायणविधिं तथा ।
स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१५॥
इस प्रकार जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर रामायणकी विधिका अनुष्ठान करता है , वह भगवान विष्णुके धाममें जाता है ; जहाँसे लौटकर वह फिर इस संसारमें नहीं आता ॥१५॥
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रामायणव्रतधरो धर्मकारी सत्तमः।
चाण्डालं पतितं वापि वस्त्रान्नेनापि नार्चयेत् ॥१६ ॥
जो रामायणसम्बन्धी व्रतको धारण करनेवाला तथा धर्मात्मा है , वह श्रेष्ठ पुरुष चाण्डाल अथवा पतित मनुष्यका वस्त्र और अन्नसे भी सत्कार न करे ॥१६ ॥
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नास्तिकान् भिन्नमर्यादान् निन्दकान् पिशुनानपि । रामायणव्रतपरो वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥१७॥
जो नास्तिक , धर्ममर्यादाको तोड़नेवाले , परनिन्दक और चुगलखोर हैं , उनका रामायणव्रतधारी पुरुष वाणीमात्रसे भी आदर न करे ॥१७॥
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कुण्डाशिनं गायकं च तथा देवलकाशनम्।
भिषजं काव्यकर्तारं देवद्विजविरोधिनम् ।। १८ ॥ परान्नलोलुपं चैव परस्त्रीनिरतं तथा ।
रामायणवतपरो वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥१९॥
जो पति के जीवित रहते ही पर पुरुषके समागम से माता द्वारा उत्पन्न किया जाता है , उस जारज पुत्र को ' कुण्ड ' कहते हैं । ऐसे कुण्डके यहाँ जो भोजन करता है , जो गीत गाकर जीविका चलाता है , देवता पर चढी हुई वस्तु का उपभोग करने वाले मनुष्य का अन्न खाता है , वैद्य है , लोगों की मिथ्या प्रशंसा में कविता लिखता है , देवताओं तथा ब्राह्मणोंका विरोध करता है , पराये अन्न का लोभी है और पर - स्त्रीमें आसक्त रहता है , ऐसे मनुष्यका भी रामायण व्रती पुरुष वाणी मात्र से भी आदर न करे॥१८-१९॥
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इत्येवमादिभिः शुद्धो वशी सर्वहिते रतः।
रामायणपरो भूत्वा परां सिद्धिं गमिष्यति॥२०॥
इस प्रकार दोषोंसे दूर एवं शुद्ध होकर जितेन्द्रिय एवं सब के हित में तत्पर रहते हुए जो रामायण का आश्रय लेता है,वह परमसिद्धिको प्राप्त होता है ॥२०॥
नास्ति गंगासमं तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरुः।
नास्ति विष्णुसमो देवो नास्ति रामायणात् परम्।।२१॥
गंगाके समान तीर्थ , माताके तुल्य गुरु , भगवान् विष्णु के सदृश देवता तथा रामायण से बढ़कर कोई उत्तम वस्तु नहीं है॥२१॥
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नास्ति वेदसमं शास्त्रं नास्ति शान्तिसमं सुखम् ।
नास्ति शान्तिपरं ज्योतिर्नास्ति रामायणात् परम् २२॥
वेदके समान शास्त्र , शान्तिके समान सुख , शान्तिसे बढ़कर ज्योति तथा रामायणसे उत्कृष्ट कोई काव्य नहीं है ।
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नास्ति क्षमासमं सारं नास्ति कीर्तिसमं धनम् ।
नास्ति ज्ञानसमो लाभो नास्ति रामायणात् परम् ॥ २३॥
क्षमा के सदृश बल , कीर्ति के समान धन , ज्ञान के सदृश लाभ तथा रामायण से बढ़कर कोई उत्तम ग्रन्थ नहीं है ।।२३॥
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तदन्ते वेदविदुषे गां दद्याच्च सदक्षिणाम्।
रामायणं पुस्तकं च वस्त्रालंकरणादिकम् ॥२४ ॥
रामायणकथा के अंत मे वेदज्ञ वाचक को दक्षिणासाहित गौ का दान करें, उन्हें रामायण की पुस्तक एवं वस्त्र आभूषण जो आपका सामर्थ्य हो, वह दान करें ।
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रामायणपुस्तकं यो वाचकाय प्रयच्छति ।
से याति विष्णुभवनं यत्र गत्वा न शोचति ॥२५॥
जो वाचक को रामायण की पुस्तक देता है , वह भगवान् विष्णु के धाम में जाता है ; जहाँ जाकर उसे कभी शोक नहीं करना पड़ता ॥२५॥
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नवाहजफलं कर्तुः शृणु धर्मविदां वर।
पञ्चम्यां तु समारभ्य रामायणकथामृतम्॥२६॥ कथाश्रवणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ सनत्कुमार ! रामायणकी नवाह कथा सुननेसे यजमान को जो फल प्राप्त होता है , उसे सुनो । पञ्चमी तिथि को रामायणकी अमृतमयी कथाको आरम्भ करके उसके श्रवणमात्र से मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥२६॥
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यदि द्वयं कृतं तस्य पुण्डरीकफलं लभेत् ॥२७ ॥
व्रतधारी तु श्रवणं यः कुर्यात् स जितेन्द्रियः।
अश्वमेधस्य यज्ञस्य द्विगुणं फलमश्नुते ॥२८ ॥
चतुःकृत्वः श्रुतं येन कथितं मुनिसत्तमाः।
स लभेत् परमं पुण्यमग्निष्टोमाष्टसम्भवम् ॥२९॥
यदि दो बार यह कथा श्रवण की गयी तो श्रोता को पुण्डरीक यज्ञ का फल मिलता है ।जो जितेन्द्रिय पुरुष व्रतधारणपूर्वक रामायण - कथाको श्रवण करता है , वह दो अश्वमेधयज्ञों का फल पाता है । मुनिवरो ! जिसने चार बार इस कथाका श्रवण किया है , वह आठ अग्निष्टोम के परम पुण्यफल का भागी होता है ।२७-२९॥
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पञ्चकृत्वो व्रतमिदं कृतं येन महात्मना ।
अत्यग्निष्टोमजं पुण्यं द्विगुणं प्राप्नुयान्नरः॥३०॥
जिस महामनस्वी पुरुषने पाँच बार रामायणकथा श्रवणका व्रत पूरा कर लिया है , वह अत्यग्निष्टोमयज्ञ के द्विगुण पुण्य - फल का भागी होता है।॥३०॥
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एवं व्रतं च षड्वारं कुर्याद् यस्तु समाहितः ।
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् ॥३१॥
जो एकाग्रचित्त होकर इस प्रकार छ : बार रामायणकथाके व्रतका अनुष्ठान पूरा कर लेता है , वह अग्निष्टोमयज्ञके आठगुने फलका भागी होता है ॥३१॥
नारी वा पुरुषः कुर्यादष्टकृत्वो मुनीश्वराः।
नरमेधस्य यज्ञस्य फलं पञ्चगुणं लभेत् ॥ ३२ ॥
मुनीश्वरो ! स्त्री हो या पुरुष , जो आठ बार रामायणकथा को सुन लेता है, वह नरमेघयज्ञ का पांच गुणा अधिक फल पाता है ।____________________________________
नरो वाप्यथ नारी वा नववारं समाचरेत् । गोमेधसवर्ज पुण्यं स लभेत् त्रिगुणं नरः॥३३॥
जो स्त्री या पुरुष नौ बार इस व्रतका आचरण करता है , उसे तीन गौमेध यज्ञ का पुण्यफल प्राप्त होता है ।
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रामायणं तु यः कुर्याच्छान्तात्मा प्रयतेन्द्रियः।
स याति परमानन्दं यत्र गत्वा न शोचति॥३४॥
जो पुरुष शान्तचित्त और जितेन्द्रिय होकर रामायणयज्ञका अनुष्ठान करता है , वह उस परमानन्दमय धाम में जाता है , जहाँ जाकर उसे कभी शोक नहीं करना पड़ता ॥३४॥
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रामायणपरो नित्यं गंगास्नानपरायणः ।
धर्ममार्गप्रवक्तारो मुक्ता एवं न संशयः ॥३५॥
जो प्रतिदिन रामायणका पाठ अथवा श्रवण करता है , गंगा नहाता है और धर्ममार्गका उपदेश देता है । ऐसे लोग संसारसागरसे मुक्त ही हैं , इसमें संशय नहीं है ।
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यतीनां ब्रह्मचारिणां प्रवीराणां च सत्तमाः ।
नवाह्रा किल श्रोतव्या कथा रामायणस्य च ॥३६ ॥
महात्माओ ! यतियों , ब्रह्मचारियों तथा प्रवीरोंको भी रामायणकी नवाह कथा सुननी चाहिये ॥३६ ॥_____________________________________
श्रुत्वा नरो रामकथामतिदीप्तोऽतिभक्तितः।
ब्रह्मणः पदमासाद्य तत्रैव परिमोदते ॥३७॥
रामकथा को अत्यन्त भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य महान् तेजसे उद्दीप्त हो उठता है और ब्रह्मलोकमें जाकर वहीं आनन्दका अनुभव करता है ॥३७ ॥
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तस्माच्छृणुध्वं विप्रेन्द्रा रामायणकथामृतम्।
श्रोतॄणां च परं श्राव्यं पवित्राणामनुत्तमम्॥३८॥
इसलिये विप्रेन्द्रगण ! आपलोग रामायणकी अमृतमयी कथा सुनिये । श्रोताओंके लिये यह सर्वोत्तम श्रवणीय वस्तु है और पवित्रोंमें भी परम उत्तम है ॥ ३८ ॥
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दुःस्वप्ननाशनं धन्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नतः ।
नरोऽत्र श्रद्धया युक्तः श्लोकं श्लोकार्द्धमेव च ॥३९॥
पठते मुच्यते सद्यो ह्युपपातककोटिभिः।
सतामेव प्रयोक्तव्यं गुह्याद्गुह्यतमं तु यत्॥४०॥
दुःस्वप्नको नष्ट करनेवाली यह कथा धन्य है । इसे प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिये । जो मनुष्य श्रद्धायुक्त होकर इसका एक श्लोक या आधा श्लोक भी पढ़ता है , वह तत्काल ही करोड़ों उपपातकोंसे छुटकारा पा जाता है । यह गुह्य से भी गुह्यतम वस्तु है , इसे सत्पुरुषों को ही सुनाना चाहिये ।
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वाचयेद् रामभवने पुण्यक्षेत्रे च संसदि ।
ब्रह्मद्वेषरतानां दम्भाचाररतात्मनाम् ॥४१ ॥ लोकवञ्चकवृत्तीनां न ब्रूयादिदमुत्तमम् ।
भगवान् श्रीराम के मन्दिर में अथवा किसी पुण्य क्षेत्रमें , सत्पुरुषों की सभा में रामायण कथा का प्रवचन करना चाहिये । जो ब्रह्मद्रोही , पाखण्डपूर्ण आचारमें तत्पर तथा लोगोंको ठगनेवाली वृत्तिसे युक्त हैं , उन्हें यह परम उत्तम कथा नहीं सुनानी चाहिये ॥ ४१३ ॥
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त्यक्तकामादिदोषाणां रामभक्तिरतात्मनाम्॥४२ ॥ गुरुभक्तिरतानां च वक्तव्यं मोक्षसाधनम्।
जो काम आदि दोषोंका त्याग कर चुके हैं , जिनका मन रामभक्तिमें अनुरक्त रहता है तथा जो गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर हैं , उन्हींके समक्ष यह मोक्षकी साधनभूत कथा बाँचनी चाहिये । ४२।।
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सर्वदेवमयो रामः स्मृतश्चार्तिप्रणाशनः ॥४३ ॥ सद्भक्तवत्सलो देवो भक्त्या तुष्यति नान्यथा ।
श्रीराम सर्वदेवमय माने गये हैं ।वे आर्त प्राणियोंकी पीड़ा का नाश करने वाले हैं तथा श्रेष्ठ भक्तों पर सदा ही स्नेह रखते हैं ।वे भगवान् भक्ति से ही संतुष्ट होते हैं , दूसरे किसी उपायसे नहीं ॥४३॥
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अवशेनापि यन्नाम्नि कीर्तिते वा स्मृतेऽपि वा॥४४॥ विमुक्तपातकः सोऽपि परमं पदमश्नुते।
मनुष्य विवश होकर भी उनके नामका कीर्तन अथवा स्मरण कर लेनेपर समस्त पातकोंसे मुक्त हो परमपदका भागी होता है । ४४ ॥
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संसारघोरकान्तारदावाग्निर्मधुसूदनः॥४५॥
स्मर्तृणां सर्वपापानि नाशयत्याशु सत्तमाः ।
महात्माओ ! भगवान् मधुसूदन संसार रूपी भयंकर एवं दुर्गम वनको भस्म करनेके लिये दावानल के समान हैं । वे अपना स्मरण करनेवाले मनुष्योंके समस्त पापोंका शीघ्र ही नाश कर देते हैं ॥ ४५ ॥
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तदर्थकमिदं पुण्यं काव्यं श्राव्यमनुत्तमम् ॥४६॥
श्रवणात् पठनाद् वापि सर्वपापविनाशकृत्।
इस पवित्र काव्यके प्रतिपाद्य विषय वे ही हैं , अतः यह परम उत्तम काव्य सदा ही श्रवण करनेयोग्य है । इसका श्रवण अथवा पाठ करनेसे यह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है ॥ ४६॥
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यस्य रामरसे प्रीतिर्वर्तते भक्तिसंयुता
स एव कृतकृत्यश्च सर्वशास्त्रार्थकोविदः ।
जिसकी श्रीराम - रसमें प्रीति एवं भक्ति है , वही शास्त्रो के अर्थज्ञान में निपुण और कृतकृत्य है ।
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तदर्जितं तपः पुण्यं तत्सत्यं सफलं द्विजाः॥ ४८ ॥ यदर्थश्रवणे प्रीतिरन्यथा न हि वर्तते ।
ब्राह्मणो ! उसकी उपार्जित की हुई तपस्या पवित्र , सत्य और सफल है ; क्योंकि राम - रसमें प्रीति हुए बिना रामायणके अर्थ - श्रवणमें प्रेम नहीं होता है ४८॥
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रामायणपरा ये तु रामनामपरायणाः।।४९।।
त एव कृतकृत्याश्च घोरे कलियुगे द्विजाः।
जो द्विज इस भयंकर कलिकालमें रामायण तथा श्रीरामनामका सहारा लेते हैं , वे ही कृतकृत्य हैं ॥ ४९॥
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नवाह्रा किल श्रोतव्यं रामायणकथामृतम् ॥५०॥
ते कृतज्ञा महात्मानस्तेभ्यो नित्यं नमो नमः ।
रामायणकी इस अमृतमयी कथाका नवाह श्रवण करना चाहिये । जो महात्मा ऐसा करते हैं , वे कृतज्ञ हैं । उन्हें प्रतिदिन मेरा बारम्बार नमस्कार है ॥५०३ ॥
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रामनामैव नामैव नामैव मम जीवनम् ॥५१॥
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ।
श्रीरामका नाम - केवल श्रीराम - नाम ही मेरा जीवन है । कलियुगमें और किसी उपायसे जीवोंकी सद्गति नहीं होती , नहीं होती , नहीं होती ॥५१॥
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सूत उवाच-
एवं सनत्कुमारस्तु नारदेन महात्मना ॥५२॥
सम्यक् प्रबोधित : सद्यः परां निर्वृतिमाप ह।
सूतजी कहते हैं - महात्मा नारदजीके द्वारा इस प्रकार ज्ञानोपदेश पाकर सनत्कुमारजीको तत्काल ही परमानन्दकी प्राप्ति हो गयी।।५२॥
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तस्माच्छृणुध्वं विप्रेन्द्रा रामायणकथामृतम् ॥५३॥
नवाह्ना किल श्रोतव्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
अतः विप्रवरो ! तुम सब लोग रामायणकी अमृतमयी कथा सुनो । रामायणको नौ दिनोंमें ही सुनना चाहिये । ऐसा करनेवाला समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ।५३॥
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श्रुत्वा चैतन्महाकाव्यं वाचकं यस्तु पूजयेत्॥५४॥
तस्य विष्णुः प्रसन्नः स्यात् श्रिया सह द्विजोत्तमाः ।
द्विजोत्तमो ! इस महान् काव्यको सुनकर जो वाचककी पूजा करता है , उसपर लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं ।५४।।
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वाचके प्रीतिमापन्ने ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥५५॥
प्रीता भवन्ति विप्रेन्द्रा नात्र कार्या विचारणा ।
विप्रेन्द्रगण ! वाचक के प्रसन्न होने पर ब्रह्मा ,विष्णु,
और महादेवजी प्रसन्न हो जाते हैं । इस विषयमें कोई शंका नही । अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ५५ ॥
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रामायणवाचकाय गावो वासांसि काञ्चनम् ॥५६ ॥ रामायणपुस्तकं च दद्याद् वित्तानुसारतः।
रामायण के वाचक को अपने वैभव के अनुसार गौ , वस्त्र , सुवर्ण तथा रामायणकी पुस्तक आदि वस्तुएँ देनी चाहिये ॥५६॥
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तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणुध्वं सुसमाहिताः॥५७॥
न बाधन्ते ग्रहास्तस्य भूतवेतालकादयः ।
तस्यैव सर्वश्रेयांसि वर्द्धन्ते चरिते श्रुते ॥५८॥
उस दानका पुण्यफल बता रहा हूँ , आपलोग एकाग्रचित्त होकर सुनें । उस दाता को ग्रह तथा भूत वेताल आदि कभी बाधा नहीं पहुँचाते । श्रीरामचरित्रका अवण करनेपर श्रोता के सम्पूर्ण श्रेय की वृद्धि होती है ।
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न चाग्निर्बाधते तस्य न चौरादिभयं तथा।
एतजन्मार्जितैः पापैः सद्य एव विमुच्यते ॥ ५ ९ ॥ सप्तवंशसमेतस्तु देहान्ते मोक्षमाप्नुयात् ।
उसे न तो अग्निकी बाधा प्राप्त होती है और न चोर आदिका भय ही । वह इस जन्ममें उपार्जित किये हुए समस्त पापोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है । वह इस शरीरका अन्त होनेपर अपनी सात पीढ़ियोंके साथ मोक्षका भागी होता है ॥५९॥
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इत्येतद्वः समाख्यातं नारदेन प्रभाषितम् ॥६० ॥ सनत्कुमारमुनये पृच्छते भक्तितः पुरा ।
पूर्वकालमें सनत्कुमार मुनिके भक्तिपूर्वक पूछनेपर नारदजींने उनसे जो कुछ कहा था , वह सब मैंने आपलोगोंको बता दिया ॥६०॥
रामायणमादिकाव्यं सर्ववेदार्थसम्मतम् ॥ ६१ ॥ पुण्यं सर्वदुःखनिबर्हणम् ।
समस्तपुण्यफलदं सर्वयज्ञफलप्रदम्॥६२ ॥ रामायण आदिकाव्य है । यह सम्पूर्ण वेदार्थोकी अनुकूल है । इसके द्वारा समस्त पापोंका निवारण हो जाता है । यह पुण्यमय काव्य सम्पूर्ण दुःखोंका विनाशक तथा समस्त पुण्यों और यज्ञोंका सर्वपापहरं सम्मतिके फल देनेवाला है॥६१-६२ ॥
ये पठन्त्यत्र विबुधाः श्लोकं श्लोकार्द्धमेव च ।
न तेषां पापबन्धस्तु कदाचिदपि जायते ॥६३॥
जो विद्वान् इसके एक या आधे श्लोक का भी पाठ करते हैं , उन्हें कभी पापों का बन्धन नहीं प्राप्त होता ॥६३॥
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रामार्पितमिदं पुण्यं काव्यं तु सर्वकामदम् ।
भक्त्या शृण्वन्ति विदन्ति तेषां पुण्यफलं शृणु ॥६४ ॥
श्रीरामको समर्पित किया हुआ यह पुण्यकाव्य सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है । जो लोग भक्तिपूर्वक इसे सुनते और समझते हैं , उनको प्राप्त होनेवाले पुण्यफलका वर्णन सुनो ॥६४ ॥
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शतजन्मार्जितैः पापैः सद्य एव विमोचिताः । सहस्रकुलसंयुक्तैः प्रयान्ति परमं पदम् ॥६५ ॥
वे लोग सौ जन्मोंमें उपार्जित किये हुए पापोंसे तत्काल मुक्त हो अपनी हजारों पीढ़ियोंके साथ परमपदको प्राप्त होते हैं ।।६५॥
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किं तीर्थैर्गोप्रदानैर्वा किं तपोभिः किमध्वरैः।
अहन्यहनि रामस्य कीर्तनं परिशृण्वताम्॥६६॥
जो प्रतिदिन श्रीरामका कीर्तन सुनते हैं , उनके लिये तीर्थ - सेवन , गोदान , तपस्या तथा यज्ञोंकी क्या आवश्यकता है ॥६६॥
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चैत्रे माघे कार्तिके च रामायणकथामृतम्।
नवैरहोभिः श्रोतव्यं रामायणकथामृतम् ॥६७ ॥
चैत्र,माघ तथा कार्तिकमें रामायणकी अमृतमयी कथाका नवाह - पारायण सुनना चाहिये ॥६७ ॥
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रामप्रसादजनकं रामभक्तिविवर्धनम्।
सर्वपापक्षयकरं सर्वसम्पद्विवर्द्धनम् ॥६८ ॥
रामायण श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसन्नता प्राप्त करानेवाला , श्रीरामभक्तिको बढ़ानेवाला , समस्त पापोंका विनाशक तथा सभी सम्पत्तियोंकी वृद्धि करनेवाला है ॥ ६८ ॥
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यस्त्वेतच्छृणुयाद् वापि पठेद् वा सुसमाहितः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥६ ९ ॥
जो एकाग्रचित्त होकर रामायणको सुनता अथवा पढ़ता है , वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥६९॥
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यह वाल्मीकि रामायण का पंचम अध्याय है, , जिसमे वाल्मीकि रामायण पाठ की विधि आदि का वर्णन था, एवं रामायणपाठ के लाभ का वर्णन है ।
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