आलेख : पुतिन का सत्तामोह ( राकेश अचल वरिष्ठ पत्रकार)

सामान   सौ बरस का पल की खबर नहीं ' लिखने वाले रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के आत्मविश्वास को देखकर हैरान हो सकते हैं.सत्तर वर्ष के पुतिन ने 85  वर्ष  की उम्र तक सिंघासन पार बने रहने का रास्ता अपने हाथ से साफ़ कर लिया है .अब  रूस  के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन  का अगले 15 साल तक सत्ता में बने रहेंगे. . उन्होंने अंतत : उस विधेयक  पर हस्ताक्षर  कर दिए, जिसमें उन्हें वर्ष 2036 तक सत्ता में बने रहने का अधिकार दिया गया है. 
सनक पूर्ण   फैसले करने वाले पुतिन दुनिया के पहले नेता नहीं हैं,उनकी फेहरिश्त लम्बी है ,लेकिन पुतिन का इस सूची में शामिल हो जाना कुछ हैरान करता है .
आपको याद होगा कि बतौर राष्ट्रपति, पुतिन  का यह लगातार दूसरा और कुल मिलाकर चौथा कार्यकाल है. निवर्तमान संविधान के मुताबिक उन्हें 2024 में सत्ता छोड़नी थी लेकिन अब संविधान में संशोधन की वजह से वे अगले 15 साल और अपने पदों पर बने सकेंगे. व्लादीमीर पुतिन ने पिछले साल देश में एक मतसंग्रह करवाया था, जिसमें उन्हें 6-6 साल के दो और कार्यकाल की छूट दी गई थी. भारी विरोध के बीच हुए मतदान में पुतिन ने भारी मतों से जीत का दावा किया था. उसके बाद यह प्रस्ताव रूसी संसद के जरिए होते हुए राष्ट्रपति पुतिन तक पहुंचा था.
रूस से छनकर आने वाली खबरों के मुताबिक़  वर्ष 2024 के बाद रूसी राष्ट्रपति  के लिए 6-6 साल का कार्यकाल होगा. अगर पुतिन दोनों बार जीत हासिल कर लेते हैं तो वे वर्ष 2036 तक रूस के राष्ट्रपति बने रहेंगे. ऐसा करके वे सबसे ज्यादा समय तक शासन करने के रूसी शासक जोसेफ स्टालिन और पीटर का भी रिकॉर्ड तोड़ देंगे. हाल ही में रूसी संसद द्वारा पारित विधेयक  में पुतिन को अगले 20 साल तक चुनाव लड़ने और सत्ता में आने का अधिकार दिया गया है. 

रूस में नया इतिहास लिखने जा रहे पुतिन 7  अक्टूबर 1962  की पैदाइश हैं .उन्हें अपने अगले पंद्रह साल जीवित रहने का पूरा भरोसा है .पूर्व राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव (को भी इस बिल में नए अधिकार दिए गए हैं. मेदवेदेव वर्ष 2008 से 12 तक रूस के राष्ट्रपति रहे थे. उन्हें भी दो बार और चुनाव लड़ने की छूट दी गई है. पुतिन के विरोधियों ने इन सारी पहलकदमी की आलोचना की है. वे इन सारे प्रयासों को पुतिन के जीवन भर राष्ट्रपति रहने और रूस का नया तानाशाह बनने के रूप में देखते हैं. हालांकि इस नए क़ानून पर दस्तखत  करने से पहले पुतिन ने कहा था कि उनका 2024 तक का कार्यकाल उनके लिए काफी है. उन्होंने यह भी कहा था कि 2024 के बाद चुनाव लड़ने के बारे में उन्होंने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है.
सत्ता में जनादेश के जरिये या संविधान में तोड़फोड़ कर बने रहने की इन कोशिशों के पीछे जाहिर है कि मानसिकता में कहीं न खिन कोई तानाशाह बैठा रहता है. भारत में 1974  का आपातकाल इसी तरह की मानसिकता का एक संकेत था,लेकिन भारत का सौभाग्य कि देश दोबारा पटरी पर वापस आ गया .लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से संविधान,के साथ छेड़छाड़ की जा रही है उसे देखते हुए हमेशा आशंका बनी रहती है कि कहीं भारत के नेता भी पुतिन का अनुशरण न करने लगें. भारत में अभी ऐसा कोई क़ानून नहीं है कि कोई ,कितने बार देश का प्रधानमंत्री बन सकता है.जिनका नसीब होता ही वे लम्बे समय तक प्र्धानमंत्री रहे और जिनका नसीब खोता था वे चार महीने भी पद पर नहीं रह पाए .
रूस एक समय में भारत का अभिन्न मित्र हुआ करता था.भारत की राजनीति पर एक जमाने में रूस के समाजवादी चिंतन का प्रभाव साफ़ देखा जा सकता था,किन्तु आज हालात बदले हुए हैं .रूस से हमारे रिश्ते बेहतर हैं लेकिन उतने दोस्ताना भी नहीं है कि हम एक-दुसरे के बिना रह ही न पाते हों .रूस की सत्ता के अपने सूत्र हैं और हमारे यहां सत्ता के अलग सूत्र हैं ,लेकिन हमारे यहां भी जिस गति से चुनाव महंगे और बाहुबल के शिकार हो रहे हैं उसे देखते हुए ये आशंका हमेशा बनी रहती है कि यहां भी किसी भी दिन कोई भक्त संसद में ऐसा निजी विधेयक ला सकता है कि माननीय प्रधानमंत्री जी को आजन्म प्रधानमंत्री बना दिया जाए .
बहुत कम लोग ऐसे हैं जो आजन्म जनता की सेवा नहीं करना चाहते.ऐसे लोग तो और भी कम हैं जो सेवानिवृर्ति नहीं चाहते .हमारे जैसे लोग तो उँगलियों पर गिने जाने वाले होंगे जो वर्षों पहले से वीतरागी हो चुके हैं .बहरहाल दुनिया के तानाशाहों की काली और दूषित छाया हमसे दूर ही.रहे .  भगवान हमारे देश के नेताओं को सद्बुद्धि दें कि वे पुतिन का दिखाया   गया रास्ता अख्तियार करने के बारे में जागते हुए क्या सोते हुए भी न सोचें .पुतिन शतायु हों ताकि वे 2036  के बाद भी रूस का नेतृत्व कर सकें .
पुतिन बाल-बच्चेदार हैं ,वे हमारे प्रधानमंत्री की  तरह घर त्यागी नहीं हैं ,लेकिन सत्ता से उनका मोह दुनिया के किसी भी शासक से रत्ती भर कम नहीं है .इसलिए जागते रहिये क्योंकि हमारी संसद भी अब ध्वनिमत से क़ानून बनाने में दक्ष हो चुकी है.कुछ कांग्रेस ने परम्परा डाली है और कुछ भाजपा ने अपने रास्ते खुद बना लिए हैं.
@ राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

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